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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 597 of 1098

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Page 597
* अध्याय १५३ *५८७

| आयान्तीमवलोक्यथ सुरसेनां गजासुरः।<br>गजरूपी महाम्भोदसङ्घातो भाति भैरवः॥ २९<br>परश्वधायुधो दैत्यो दंशितोष्ठकसम्पुटः।<br>ममर्द चरणे देवांश्चिक्षेपान्यान् करेण तु॥ ३० | तदनन्तर उस देव-सेनाको आती हुई देखकर गजासुरने घने मेघसमूहकी भाँति भयंकर हाथीका रूप धारण कर लिया। फिर तो उस भयंकर पराक्रमी दैत्येन्द्रने क्रोधसे होठोंको दाँतोंतले दबाये हुए कुठार हाथमें लेकर कुछ देवोंको चरणोंसे रौंद डाला, कुछको हाथसे पकड़कर दूर फेंक दिया तथा कुछको फरसेसे काट डाला॥ २४-३०१/२॥ |
| परान् परशुना जघ्ने दैत्येन्द्रो रौद्रविक्रमः।<br>तस्य पातयतः सेनां यक्षगन्धर्वकिंनराः॥ ३१<br>मुमुचुः संहताः सर्वे चित्रशस्त्रास्त्रसंहतिम्।<br>पाशान् परश्वधांश्चक्रान् भिन्दिपालान् समुद्गरान्॥ ३२<br>कुन्तान् प्रासानसींस्तीक्ष्णान् मुद्गरांश्चापि दुःसहान्।<br>तान् सर्वान् सोऽग्रसद् दैत्यः कवलानिव यूथपः॥ ३३<br>कोपास्फालितदीर्घग्रकरास्फोटेन पातयन्।<br>विचचार रणे देवान् दुष्प्रेक्ष्ये गजदानवः॥ ३४<br>यस्मिन् यस्मिन् निपतति सुरवृन्दे गजासुरः।<br>तस्मिंस्तस्मिन् महाशब्दो हाहाकारकृतोऽभवत्॥ ३५<br>अथ विद्रवमाणं तद्बलं प्रेक्ष्य समंततः।<br>रुद्राः परस्परं प्रोचुरहंकारोत्थिताचिर्षः॥ ३६<br>भो भो गृहीत दैत्येन्द्रं मर्दतैनं हताश्रयम्।<br>कर्षतैनं शितैः शूलैर्भङ्क्तैनं च मर्मसु॥ ३७<br>कपाली वाक्यमाकर्ण्य शूलं शितशिखामुखम्।<br>सम्मार्ज्य वामहस्तेन संरम्भविवृतेक्षणः॥ ३८<br>अधावद् भृकुटीवक्रो दैत्येन्द्राभिमुखो रणे।<br>दृढेन मुष्टिबन्धेन शूलं विष्टभ्य निर्मलम्॥ ३९ | इस प्रकार उसे सेनाका संहार करते हुए देखकर यक्ष, गन्धर्व और किंनर—ये सभी संगठित होकर चित्र-विचित्र शस्त्रास्त्रसमूहोंकी वर्षा करने लगे। उस समय वे पाश, कुठार, चक्र, भिन्दिपाल, मुद्गर, बर्छा, भाला, तीखी तलवार और दुःसह मुद्गरोंको फेंक रहे थे, किंतु उन सबको उस यूथपति दैत्यने कौरकी भाँति निगल लिया। फिर उस दुर्दर्श युद्धमें गजासुर क्रोधसे फैलाये हुए अपने लम्बे सूँड़की चपेटसे देवताओंको धराशायी करते हुए विचरण करने लगा। वह गजासुर जिस-जिस सुरयूथपर आक्रमण करता था, उस-उस यूथमें हाहाकारपूर्वक चीत्कार होने लगता था। तदनन्तर उस देव-सेनाको चारों ओर भागती हुई देखकर अहंकारसे भरे हुए रुद्रगण परस्पर कहने लगे—'भो भो सैनिको! इस दैत्येन्द्रको पकड़ लो। इस आश्रयहीनको रौंद डालो। इसे पकड़कर खींच लो और तीखे शूलोंसे इसके मर्मस्थानोंको छेद डालो।' ऐसा ललकार सुनकर कपालीके नेत्र क्रोधसे चढ़ गये और उनकी भौंहें टेढ़ी हो गयीं। तब वे तीखे एवं चमकीले मुखवाले शूलको बायें हाथसे पोंछकर रणभूमिमें दैत्येन्द्र गजासुरके सम्मुख दौड़े। फिर कपालीने उस निर्मल शूलको सुदृढ़ मुट्ठीसे पकड़कर गजासुरके गण्डस्थलपर प्रहार किया॥ ३१—३९ १/२ ॥ |
| जघान कुम्भदेशे तु कपाली गजदानवम्।<br>ततो दशापि ते रुद्रा निर्मलायोमयै रणे॥ ४०<br>जघ्नुः शूलैश्च दैत्येन्द्रं शैलवर्ष्माणमाहवे।<br>स्रुतशोणितरन्ध्रस्तु शितशूलमुखार्दितः॥ ४१<br>बभौ कृष्णाच्छविर्दैत्यः शारदीवामलं सरः।<br>प्रोत्फुल्लारुणनीलाब्जसङ्घातं सर्वतोदिशम्॥ ४२ | तदनन्तर वे दसों रुद्र रणभूमिमें युद्ध करते समय निर्मल लोहेके बने हुए शूलोंसे पर्वत-सदृश विशालकाय दैत्येन्द्र गजपर आघात करने लगे। तीखे मुखवाले शूलोंके आघातसे पीड़ित हुए गजासुरके शरीरछिद्रोंसे रक्त बहने लगा। उस समय काली कान्तिवाला वह दैत्य शरद्-ऋतुमें सब ओरसे खिले हुए लाल और नीले कमलोंसे भरे हुए निर्मल सरोवरकी भाँति शोभा पा रहा था तथा |