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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 588 of 1098

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Page 588

५७८ * मत्स्यपुराण *


| चकम्पे मारुतेनेव नोदितः किंशुकद्रुमः।<br>तमाकम्पितमालक्ष्य गदां जग्राह केशवः॥ २३८<br>तां च वेगेन चिक्षेप कालनेमिरथं प्रति।<br>सा पपात शिरस्युग्रा विपुला कालनेमिनः॥ २३९<br>स चूर्णितोत्तमाङ्गस्तु निष्पिष्टमुकुटोऽसुरः।<br>स्स्रुतरक्तौघरन्ध्रस्तु स्रुतधातुरिवाचलः॥ २४०<br>प्रापतत् स्वे रथे भग्ने विसंज्ञः शिष्टजीवितः।<br>पतितस्य रथोपस्थे दानवस्याच्युतोऽरिहा॥ २४१<br>स्मितपूर्वमुवाचेदं वाक्यं चक्रायुधः प्रभुः।<br>गच्छासुर विमुक्तोऽसि साम्प्रतं जीव निर्भयः॥ २४२<br>ततः स्वल्पेन कालेन अहमेव तवान्तकः।<br>एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य सारथिः कालनेमिनः।<br>अपवाह्य रथं दूरमनयत् कालनेमिनम्॥ २४३ | वह झंझावातसे झकझोरे हुए पलाश-वृक्षकी भाँति काँप रहा था। उसे काँपता हुआ देखकर भगवान् केशवने गदा उठायी और उसे वेगपूर्वक कालनेमिके रथपर फेंक दिया। वह भयंकर एवं विशाल गदा कालनेमिके मस्तकपर जा गिरी। उसके आघातसे उस असुरका मस्तक चूर्ण हो गया, मुकुट पिस गया और शरीरके छिद्रोंसे रक्तकी धाराएँ बहने लगीं। उस समय वह ऐसा दीख रहा था मानो चूते हुए गेरु आदि धातुओंसे युक्त पर्वत हो। तत्पश्चात् वह मूर्च्छित होकर अपने टूटे हुए रथपर गिर पड़ा। उसके प्राणमात्र अवशेष थे। इस प्रकार रथके पिछले भागमें पड़े हुए उस दानवके प्रति चक्रायुधधारी एवं सामर्थ्यशाली शत्रुसूदन अच्युतने मुसकराते हुए यह बात कही—'असुर! जाओ, इस समय तुम छोड़ दिये गये हो, अतः निर्भय होकर जीवन धारण करो। फिर थोड़े ही समयके बाद मैं ही तुम्हारा विनाश करूँगा।' भगवान् विष्णुके उस वचनको सुनकर कालनेमिका सारथि रथको लौटाकर कालनेमिको रणभूमिसे दूर हटा ले गया॥ २३२—२४३॥ |

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे देवासुरसंग्रामे कालनेमिपराजयो नाम पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥ १५०॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके देवासुरसंग्राममें कालनेमिपराजय नामक एक सौ पचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ १५०॥


एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय

भगवान् विष्णुपर दानवोंका सामूहिक आक्रमण, भगवान् विष्णुका अद्भुत युद्ध-कौशल और उनके द्वारा दानवसेनापति ग्रसनकी मृत्यु

| सूत उवाच<br>तं दृष्ट्वा दानवाः क्रुद्धाश्चेरुः स्वैः स्वैर्बलैर्वृताः।<br>सरघा इव माक्षीकहरणे सर्वतो दिशम्॥ १<br>कृष्णचामरजालाढ्ये सुधाविरचिताङ्कुरे।<br>चित्रपञ्चपताकेषु प्रभिन्नकरटामुखे॥ २<br>पर्वताभे गजे भीमे मदस्त्राविणि दुर्धरे।<br>आरुह्याजी निमिर्दैत्यो हरिं प्रत्युद्ययौ बली॥ ३<br>तस्यासन् दानवा रौद्रा गजस्य पदरक्षिणः।<br>सप्तविंशतिसाहस्त्राः किरीटकवचोज्ज्वलाः॥ ४ | **सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! भगवान् विष्णुको देखकर क्रोधमें भरे हुए सभी दानवेन्द्र अपनी-अपनी सेनाके साथ उनके ऊपर इस प्रकार टूट पड़े जैसे मधु निकालते समय मधु निकालनेवालेको मधुमक्खियाँ चारों ओरसे घेर लेती हैं। उस समय महाबली दैत्यराज निमिने जो काले चँवरोंसे सुशोभित था, जिसके मस्तकपर उज्ज्वल पत्रभंगी की गयी थी, जिसके गण्डस्थलका मुख फूट जानेसे मद चू रहा था, जो पर्वतके समान विशालकाय था और जिसपर रंग-बिरंगी पाँच पताकाएँ फहरा रही थीं, ऐसे दुर्धर्ष एवं भयंकर गजराजपर चढ़कर युद्धस्थलमें श्रीहरिपर आक्रमण किया। उसके हाथीकी पदरक्षामें सत्ताईस हजार भयंकर दानव नियुक्त थे, जो उज्ज्वल |