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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 580 of 1098

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Page 580
५७०* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रथमारुह्य जग्राह रक्षो वामकरेण तु।<br>केशेषु निर्ऋतिं दैत्यो जानुनाक्रम्य धिष्ठितम्॥ १२६<br><br>ततः खड्गेन च शिरश्छेत्तुमैच्छदमर्षणः।<br>तस्मिंस्तदन्तरे देवो वरुणोऽपाम्पतिर्द्रुतम्॥ १२७<br><br>पाशेन दानवेन्द्रस्य बबन्ध च भुजद्वयम्।<br>ततो बद्धभुजं दैत्यं विफलीकृतपौरुषम्॥ १२८होनेपर अत्यन्त दुर्जय दानवेश्वरने रथपर आरूढ़ हो बायें हाथसे राक्षसेश्वरको पकड़ लिया। तब क्रोधसे भरा हुआ दैत्य कुजम्भ निर्ऋतिके बालोंको पकड़कर और घुटनोंसे दबाकर खड़ा हो गया तथा तलवारसे उनका सिर काट लेनेके लिये उद्यत हो गया। इसी बीच जलेश वरुणदेवने शीघ्र ही अपने पाशसे दानवेन्द्रकी दोनों भुजाओंको बाँध दिया। इस प्रकार दोनों भुजाओंके बँध जानेपर दैत्यका पुरुषार्थ विफल कर दिया गया॥ १२६-१२८॥
ताडयामास गदया दयामुत्सृज्य पाशधृक्।<br>स तु तेन प्रहारेण स्रोतोभिः क्षतजं वमन्॥ १२९<br><br>दधार रूपं मेघस्य विद्युन्मालालतावृतम्।<br>तदवस्थागतं दृष्ट्वा कुजम्भं महिषासुरः॥ १३०<br><br>व्यावृत्तवदनेऽगाधे ग्रस्तुमैच्छत् सुरावुभौ।<br>निर्ऋतिं वरुणं चैव तीक्ष्णदंष्ट्रोत्कटाननः॥ १३१<br><br>तावभिप्रायमालक्ष्य तस्य दैत्यस्य दूषितम्।<br>त्यक्त्वा रथपथं भीतौ महिषस्यातिरंहसा॥ १३२<br><br>भृशं द्रुतौ जवाद्दिग्भ्यामुभाभ्यां भयविह्वलौ।<br>जगाम निर्ऋतिः क्षिप्रं शरणं पाकशासनम्॥ १३३<br><br>कुद्धस्तु महिषो दैत्यो वरुणं समभिद्रुतः।<br>तमन्तकमुखासक्तमालोक्य हिमवद्द्युतिः॥ १३४<br><br>चक्रे सोमास्त्रनिःसृष्टं हिमसंघातकण्टकम्।<br>वायव्यं चास्त्रमतुलं चन्द्रश्चक्रे द्वितीयकम्॥ १३५<br><br>वायुना तेन चन्द्रेण संशुष्केण हिमेन च।<br>व्यथिता दानवाः सर्वे शीतोच्छिन्ना विपौरुषाः॥ १३६<br><br>न शेकुश्चलितुं पद्भ्यां नास्त्राण्यादातुमेव च।<br>महाहिमनिपातेन शस्त्रैश्चन्द्रप्रचोदितैः॥ १३७तदनन्तर पाशधारी वरुणने दयाको तिलाञ्जलि देकर उस दैत्यपर गदासे प्रहार किया। उस गदाघातसे घायल होकर कुजम्भ (मुख, नाक, कान आदि) छिद्रोंसे रक्त वमन करने लगा। उस समय उसका रूप ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो विद्युत्समूहोंसे आच्छादित मेघ हो। कुजम्भको ऐसी दशामें पड़ा देखकर तीक्ष्ण दाढ़ोंसे युक्त एवं विकराल मुखवाला महिषासुर अपने गहरे मुखको फैलाकर वरुण और निर्ऋति—इन दोनों देवताओंको निगल जानेका प्रयास करने लगा। तब वे दोनों देव उस दैत्यके क्रूर अभिप्रायको समझकर भयभीत हो गये और बड़ी शीघ्रतासे महिषासुरके रथ-मार्गको छोड़कर हट गये। फिर भयसे व्याकुल होकर दोनों बड़े वेगसे दो भिन्न दिशाओंकी ओर भाग चले। उनमें निर्ऋतिने तो तुरंत ही भागकर इन्द्रकी शरण ग्रहण की। उधर कुपित महिषासुरने वरुणका पीछा किया। इस प्रकार वरुणको मौतके मुखमें पड़ा हुआ देखकर शीतरश्मि चन्द्रमाने अपने सोमास्त्रको प्रकट किया, जो हिमसमूहसे व्याप्त होनेके कारण अत्यन्त दुःसह था। उसी समय चन्द्रमाने अपने दूसरे अनुपम अस्त्र वायव्यास्त्रका भी प्रादुर्भाव किया। चन्द्रमाद्वारा छोड़े गये उस वायव्यास्त्र एवं सूखे हिमास्त्रसे सभी दानव व्यथित हो उठे। वे शीतसे जर्जर हो गये और उनका पुरुषार्थ जाता रहा। चन्द्रमाद्वारा चलाये गये अस्त्रोंसे महान् हिमराशिके गिरनेसे समस्त दानव न तो एक पग चल सकते थे और न अस्त्र ही उठानेमें समर्थ थे॥ १२९—१३७॥
गात्राण्यसुरसैन्यानामदहन्त समंततः।<br>महिषो निष्प्रयत्नस्तु शीतेनाकम्पिताननः॥ १३८<br><br>कक्षावालम्ब्य पाणिभ्यामुपविष्टो ह्यधोमुखः।<br>सर्वे ते निष्प्रतीकारा दैत्याश्चन्द्रमसा जिताः॥ १३९इस प्रकार चारों ओर असुर-सैनिकोंके शरीर शीतसे ठिठुर गये। शीतसे काँपते हुए मुखवाला महिष भी प्रयत्नहीन हो गया। वह अपने दोनों हाथोंसे दोनों काँखोंको दबाकर नीचे मुख किये हुए बैठ गया। इस प्रकार चन्द्रमासे पराजित हुए वे सभी दैत्य बदला चुकानेमें असमर्थ हो गये।