मत्स्य महापुराण

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५६२ * मत्स्यपुराण *
| न तु व्यर्थशतोद्घुष्टसम्भावितधनो नरः।<br>एवं संचिन्त्य वेगेन समुत्तस्थौ महाबलः॥ २५<br><br>मुद्गरं कालदण्डाभं गृहीत्वा गिरिसंनिभः।<br>ग्रसनो घोरसंकल्पः संदष्टौष्ठपुटच्छदः॥ २६<br><br>रथेन त्वरितो गच्छन्नाससादान्तकं रणे।<br>समासाद्य यमं युद्धे ग्रसनो भ्राम्य मुद्गरम्॥ २७<br><br>वेगेन महता रौद्रं चिक्षेप यममूर्धनि।<br>विलोक्य मुद्गरं दीप्तं यमः सम्भ्रान्तलोचनः॥ २८<br><br>वञ्चयामास दुर्धर्षं मुद्गरं स महाबलः।<br>तस्मिन्प्रसृते दूरं चण्डानां भीमकर्मणाम्॥ २९<br><br>याम्यनां किङ्कराणां तु सहस्रं निष्पिषेष ह।<br>ततस्तां निहतां दृष्ट्वा घोरां किङ्करवाहिनीम्॥ ३०<br><br>अगमत् परं क्षोभं नानाप्रहरणोद्यतः।<br>ग्रसनस्तु समालोक्य तां किङ्करमयीं चमूम्॥ ३१<br><br>मेने यमसहस्राणि सृष्टानि यममायया।<br>निग्राह्य ग्रसनः सेनां विसृजन्नस्त्रवृष्टयः॥ ३२<br><br>कल्पान्तघोरसङ्काशो बभूव क्रोधमूर्च्छितः।<br>कांश्चिद बिभेद शूलेन कांश्चिद बाणैरजिह्मगैः॥ ३३<br><br>कांश्चित्पिपेष गदया कांश्चिन्मुद्गरवृष्टिभिः।<br>केचित्प्रासप्रहारैश्च दारुणैस्ताडितास्तदा॥ ३४<br><br>अपरे बहुशस्तस्य ललम्बुर्बाहुमण्डले।<br>शिलाभिरपरे जघ्नुर्द्रुमैरन्यैर्महोच्छ्रयैः॥ ३५ | किंतु जो पुरुष सैकड़ों बार योग्य घोषित किया जा चुका है, वह स्वच्छन्द नहीं हो सकता। (अर्थात् जिसकी जगत्में कोई प्रतिष्ठा नहीं है, वह स्वेच्छानुसार कार्य कर सकता है, किंतु जो सैकड़ों बार लब्धप्रतिष्ठ हो चुका है, उसे स्वामीके अधीन रहकर ही कार्य करना चाहिये।) ऐसा विचारकर महाबली ग्रसन वेगपूर्वक उठ खड़ा हुआ। उसका शरीर पर्वतके समान विशाल था। वह भयंकर विचारसे युक्त था और क्रोधवश दाँतोंसे होंठको दबाये हुए था। इस प्रकार वह शीघ्रतापूर्वक रथपर सवार हो हाथमें कालदण्डके सदृश मुद्गर लेकर रणभूमिमें यमराजके निकट आ पहुँचा। युद्धस्थलमें यमराजके सम्मुख आकर ग्रसनने उस भयानक मुद्गरको बड़े वेगसे घुमाकर यमराजके मस्तकपर फेंक दिया। उस प्रकाशमान मुद्गरको आते हुए देखकर यमराजके नेत्र चकमका गये। तत्पश्चात् महाबली यमराजने अपने स्थानसे हटकर उस दुर्धर्ष मुद्गरको लक्ष्यसे वञ्चित कर दिया। यमराजके दूर हट जानेपर उस मुद्गरने यमराजके हजारों पराक्रमी एवं भयंकर कर्म करनेवाले किंकरोंको पीस डाला। तत्पश्चात् उस भयंकर किंकर-सेनाको मारी गयी देखकर यमराजको परम क्षोभ हुआ। तब वे नाना प्रकारके अस्त्रोंका प्रहार करनेके लिये उद्यत हो गये॥ २२—३० १/२॥<br><br>उधर ग्रसनने उस सेनाको किंकरोंसे व्याप्त देखकर ऐसा समझा कि यमराजकी मायाद्वारा रचे गये ये हजारों यमराज ही हैं। फिर तो ग्रसन सेनाको रोककर उसपर अस्त्रोंकी वृष्टि करने लगा। उस समय वह कल्पान्तके समय क्षुब्ध हुए भयंकर समुद्रकी भाँति क्रोधसे विह्वल हो उठा था। उसने कुछ किंकरोंको त्रिशूलसे और कुछको सीधे जानेवाले बाणोंसे विदीर्ण कर दिया। कुछको गदाके प्रहारसे और कुछको मुद्गरोंकी वर्षासे पीस डाला। कुछ भयंकर भालोंके प्रहारसे घायल कर दिये गये। दूसरे बहुत-से उसकी बाहुओंपर लटके हुए थे। इधर किंकरोंमेंसे बहुत-से लोग शिलाओंद्वारा तथा अन्य कुछ लोग ऊँचे-ऊँचे वृक्षोंद्वारा ग्रसनपर |