मत्स्य महापुराण

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| ५६० | * मत्स्यपुराण * |
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एक सौ पचासवाँ अध्याय
देवताओं और असुरोंकी सेनाओंमें अपनी-अपनी जोड़ीके साथ घमासान युद्ध, देवताओंके विकल होनेपर भगवान् विष्णुका युद्धभूमिमें आगमन और कालनेमिको परास्त कर उसे जीवित छोड़ देना
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सूत उवाच<br>अथ ग्रसनमालोक्य यमः क्रोधविमूर्च्छितः।<br>ववर्ष शरवर्षेण विशेषेणाग्निवर्चसाम्॥ १<br>स विद्धो बहुभिर्बाणैर्ग्रसनोऽतिपराक्रमः।<br>कृतप्रतिकृताकाङ्क्षी धनुरानम्य भैरवम्॥ २<br>शतैः पञ्चभिरत्युग्रैः शराणां यममर्दयत्।<br>स विचिन्त्य यमो बाणान् ग्रसनस्यातिपौरुषम्॥ ३<br>बाणवृष्टिभिरुग्राभिर्यमो ग्रसनमर्दयत्।<br>कृतान्तशरवृष्टिं तां वियति प्रतिसर्पिणीम्॥ ४<br>चिच्छेद शरवर्षेण ग्रसनो दानवेश्वरः।<br>विफलां तां समालोक्य यमस्तां शरसंततिम्॥ ५<br>स विचिन्त्य शरव्रातं ग्रसनस्य रथं प्रति।<br>चिक्षेप मुद्गरं घोरं तरसा तस्य चान्तकः॥ ६<br>स तं मुद्गरमायान्तमुत्प्लुत्य गगनस्थितम्।<br>जग्राह वामहस्तेन याम्यं दानवनन्दनः॥ ७<br>तमेव मुद्गरं गृह्य यमस्य महिषं रुषा।<br>पातयामास वेगेन स पपात महीतले॥ ८<br>उत्प्लुत्याथ यमस्तस्मान्महिषान्निष्पतिष्यतः।<br>प्रासेन ताडयामास ग्रसनं वदने दृढम्॥ ९<br>स तु प्रासप्रहारेण मूर्च्छितो न्यपतद् भुवि।<br>ग्रसनं पतितं दृष्ट्वा जम्भो भीमपराक्रमः॥ १०<br>यमस्य भिन्दिपालेन प्रहारमकरोद्धृदि।<br>यमस्तेन प्रहारेण सुस्राव रुधिरं मुखात्॥ ११ | सूतजी कहते हैं—ऋषिगण! तदनन्तर (रणभूमिमें असुर-सेनानी) ग्रसनको सम्मुख उपस्थित देखकर यमराज क्रोधसे क्षुब्ध हो उठे। उन्होंने ग्रसनके ऊपर अग्निके समान तेजस्वी बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी। अत्यन्त पराक्रमी ग्रसन भी बहुसंख्यक बाणोंके प्रहारसे घायल होकर भयंकर धनुषकी प्रत्यञ्चा चढ़ाकर अत्यन्त भीषण पाँच सौ बाणोंसे यमराजको बींध डाला। उन बाणोंके आघातसे ग्रसनके प्रबल पुरुषार्थका भलीभाँति विचार कर यमराज पुनः घोर बाणवृष्टिद्वारा ग्रसनको पीड़ा पहुँचाने लगे। तब दानवेश्वर ग्रसनने गगनमण्डलमें फैलती हुई यमराजकी उस बाणवृष्टिको अपने बाणोंकी वर्षासे छिन्न-भिन्न कर दिया। इस प्रकार अपनी उस बाणवृष्टिको विफल हुई देखकर यमराज अपने बाणसमूहोंके विषयमें विचार करने लगे। तत्पश्चात् उन्होंने उस ग्रसनके रथपर बड़े वेगसे अपना भयंकर मुद्गर फेंका। उस मुद्गरको अपनी ओर आते देख दानवनन्दन ग्रसनने रथसे उछलकर ऊपर-ही-ऊपर यमराजके उस मुद्गरको बायें हाथसे पकड़ लिया और उसी मुद्गरको लेकर क्रोधपूर्वक बड़े वेगसे यमराजके भैंसेपर दे मारा, जिसके आघातसे वह धराशायी हो गया। तब यमराज उस गिरते हुए भैंसेकी पीठसे उछलकर अलग हो गये। फिर तो उन्होंने भालेसे ग्रसनके मुखपर गहरी चोट पहुँचायी। तब भालेके प्रहारसे मूर्च्छित होकर ग्रसन भूतलपर गिर पड़ा। ग्रसनको धराशायी हुआ देखकर भयंकर पराक्रमी जम्भने भिन्दिपाल (ढेलवाँस)-से यमराजके हृदयपर प्रहार किया। उस प्रहारसे घायल होकर यमराज मुखसे खून उगलने लगे॥ १—११॥ |
| कृतान्तमर्दितं दृष्ट्वा गदापाणिर्धनाधिपः।<br>वृतो यक्षायुतशतैर्जम्भं प्रत्युद्ययौ रुषा॥ १२ | इस प्रकार यमराजको घायल हुआ देखकर धनेश्वर कुबेरने हाथमें गदा लेकर दस लाख यक्षोंके साथ क्रोधपूर्वक जम्भपर धावा किया। |