मत्स्य महापुराण

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५४८ * मत्स्यपुराण *
| त्रासितास्म्यपविद्धास्मि कर्षिता पीडितास्मि च।<br>रौद्रेण देवराजेन नष्टनाथेव भूरिशः॥ १३<br>दुःखस्यान्तमपश्यन्ती प्राणांस्त्यक्तुं व्यवस्थिता।<br>पुत्रं मे तारकं देहि ह्यस्माद् दुःखमहार्णवात्॥ १४<br>एवमुक्तस्तु संक्षुब्धस्तस्याः पुत्रार्थमुद्यतः।<br>तपो घोरं करिष्यामि जयाय त्रिदिवौकसाम्॥ १५<br>एतच्छ्रुत्वा वचो देवः पद्मगर्भोद्भवस्तदा।<br>उवाच दैत्यराजानं प्रसन्नश्चतुराननः॥ १६ | है कि—'नाथ! देवराज इन्द्रने निर्दय होकर मुझे अनाथ नारीकी तरह अनेक प्रकारसे डराया, अपमानित किया, घसीटा है और कष्ट पहुँचाया है। दुःखका अन्त न देखकर मैं प्राण-त्याग करनेको उद्यत हो गयी हूँ। इसलिये मुझे इस दुःखरूपी महासागरसे उद्धार करनेवाला पुत्र प्रदान कीजिये।' उसके ऐसा कहनेपर मेरा मन संक्षुब्ध हो उठा है। इसलिये मैं उसे पुत्र प्रदान करनेके लिये उद्यत हो देवताओंपर विजय पानेके लिये घोर तप करूँगा। उसकी यह बात सुनकर पद्मसम्भव चतुर्मुख ब्रह्मा प्रसन्न हो गये और उस दैत्यराजसे बोले॥ १०—१६॥ |
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| ब्रह्मोवाच<br>अलं ते तपसा वत्स मा क्लेशे दुस्तरे विश।<br>पुत्रस्ते तारको नाम भविष्यति महाबलः॥ १७ | ब्रह्माने कहा—वत्स! तुम्हारी तपस्या पूरी हो चुकी है। अब तुम उस दुस्तर क्लेशपूर्ण कार्यमें मत प्रविष्ट होओ। तुम्हें तारक नामका ऐसा महाबली पुत्र प्राप्त होगा, |
| देवसीमन्तिनीनां तु धम्मिल्लस्य विमोक्षणः।<br>इत्युक्तो दैत्यनाथस्तु प्रणिपत्य पितामहम्॥ १८ | जो देवाङ्गनाओंके केशकलापको खोल देनेवाला होगा (अर्थात् उन्हें विधवाकी स्थितिमें ला देगा)। ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर दैत्यराज |
| आगत्यानन्दयामास महिषीं हर्षिताननः।<br>तौ दम्पती कृतार्थौ तु जग्मतुः स्वाश्रमं मुदा॥ १९ | वज्राङ्गका मुख हर्षसे खिल उठा। तब वह ब्रह्माजीके चरणोंमें प्रणिपात करके अपनी पटरानी वराङ्गीके पास आया और उसने (पुत्र-प्राप्तिके वरदानकी बात बतलाकर) उसे आनन्दित किया। तत्पश्चात् दोनों पति-पत्नी कृतार्थ होकर प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रमको लौट गये। |
| वज्राङ्गेनाहितं गर्भं वराङ्गी वरवर्णिनी।<br>पूर्णं वर्षसहस्रं च दधारोदर एव हि॥ २० | समयानुसार वज्राङ्गद्वारा स्थापित किये गये गर्भको सुन्दरी वराङ्गी पूरे एक हजार वर्षोंतक अपने उदरमें ही धारण किये रही। |
| ततो वर्षसहस्रान्ते वराङ्गी सुषुवे सुतम्।<br>जायमाने तु दैत्येन्द्रे तस्मिँल्लोकभयङ्करे॥ २१ | एक हजार वर्ष पूरा होनेपर वराङ्गीने पुत्र उत्पन्न किया। उस लोकभयंकर दैत्येन्द्रके जन्म लेते ही |
| चचाल सकला पृथ्वी समुद्राश्च चकम्मिरे।<br>चेलुर्महीधराः सर्वे ववुर्वाताश्च भीषणाः॥ २२ | सारी पृथ्वी डगमगा उठी अर्थात् भूकम्प आ गया, समुद्रोंमें ज्वार-भाटा उठने लगा, सभी पर्वत विचलित हो उठे, भयानक झंझावात बहने लगा। |
| जेपुर्जप्यं मुनिवरा नेदुर्व्यालमृगा अपि।<br>चन्द्रसूर्यौ जहुः कान्तिं सनीहारा दिशोऽभवन्॥ २३ | श्रेष्ठ मुनिगण शान्त्यर्थ जप करने लगे, सर्प तथा वन्य पशु आदि भी उच्च स्वरसे शब्द करने लगे, चन्द्रमा और सूर्यकी कान्ति फीकी पड़ गयी तथा दिशाओंमें कुहासा छा गया। |
| जाते महासुरे तस्मिन् सर्वे चापि महासुराः।<br>आजग्मुर्हर्षितास्तत्र तथा चासुरयोषितः॥ २४ | द्विजवरो! उस महासुरके जन्म लेनेपर सभी प्रधान असुर हर्षसे भरे हुए वहाँ आ पहुँचे। |