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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 532 of 1098

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Page 532

५२२ * मत्स्यपुराण *


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एष यज्ञो महानिन्द्र स्वयम्भुविहितः पुरा।<br>एवं विश्वभुगिन्द्रस्तु ऋषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः।<br>उक्तो न प्रतिजग्राह मानमोहसमन्वितः॥ १५<br><br>तेषां विवादः सुमहान् जज्ञे इन्द्रमहर्षिणाम्।<br>जङ्गमौः स्थावरैः केन यष्टव्यमिति चोच्यते॥ १६<br><br>ते तु खिन्ना विवादेन शक्त्या युक्ता महर्षयः।<br>संधाय सममिन्द्रेण पप्रच्छुः खचरं वसुम्॥ १७इन्द्र! पूर्वकालमें ब्रह्माने इसीको महान् यज्ञ बतलाया है।' तत्त्वदर्शी ऋषियोंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर भी विश्वभोक्ता इन्द्रने उनकी बातोंको अङ्गीकार नहीं किया; क्योंकि उस समय वे मान और मोहसे भरे हुए थे। फिर तो इन्द्र और उन महर्षियोंके बीच 'स्थावरों या जङ्गमोमेंसे किससे यज्ञानुष्ठान करना चाहिये'—इस बातको लेकर वह अत्यन्त महान् विवाद उठ खड़ा हुआ। यद्यपि वे महर्षि शक्तिसम्पन्न थे, तथापि उन्होंने उस विवादसे खिन्न होकर इन्द्रके साथ संधि करके (उसके निर्णयार्थ) उपरिचर (आकाशचारी राजर्षि) वसुसे प्रश्न किया॥ ५–१७॥
ऋषय ऊचुः<br>महाप्राज्ञ त्वया दृष्टः कथं यज्ञविधिर्नृप।<br>औत्तानपादे प्रब्रूहि संशयं छिन्धि नः प्रभो॥ १८**ऋषियोंने पूछा—**उत्तानपाद-नन्दन नरेश! आप तो सामर्थ्यशाली एवं महान् बुद्धिमान् हैं। आपने किस प्रकारकी यज्ञ-विधि देखी है, उसे बतलाइये और हम लोगोंका संशय दूर कीजिये॥ १८॥
सूत उवाच<br>श्रुत्वा वाक्यं वसुस्तेषामविचार्य बलाबलम्।<br>वेदशास्त्रमनुस्मृत्य यज्ञतत्त्वमुवाच ह॥ १९<br><br>यथोपनीतैर्यष्टव्यमिति होवाच पार्थिवः।<br>यष्टव्यं पशुभिर्मेध्यैरथ मूलफलैरपि॥ २०<br><br>हिंसा स्वभावो यज्ञस्य इति मे दर्शनागमः।<br>तथैते भाविता मन्त्रा हिंसालिङ्गा महर्षिभिः॥ २१<br><br>दीर्घेण तपसा युक्तैस्तारकादिनिदर्शनैः।<br>तत्प्रमाणं मया चोक्तं तस्माच्छमितुमर्हथ॥ २२<br><br>यदि प्रमाणं स्तान्येव मन्त्रवाक्यानि वो द्विजाः।<br>तदा प्रवर्त्ततां यज्ञो ह्यन्यथा मानृतं वचः॥ २३<br><br>एवं कृतोत्तरास्ते तु युज्यात्मानं ततो धिया।<br>अवश्यम्भाविनं दृष्ट्वा तमधो ह्यशपंस्तदा॥ २४<br><br>इत्युक्तमात्रो नृपतिः प्रविवेश रसातलम्।<br>ऊर्ध्वचारी नृपो भूत्वा रसातलचरोऽभवत्॥ २५<br><br>वसुधातलचारी तु तेन वाक्येन सोऽभवत्।<br>धर्माणां संशयच्छेत्ता राजा वसुरधोगतः॥ २६**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! उन ऋषियोंका प्रश्न सुनकर महाराज वसु उचित-अनुचितका कुछ भी विचार न कर वेद-शास्त्रोंका अनुसरण कर यज्ञतत्त्वका वर्णन करने लगे। उन्होंने कहा—'शक्ति एवं समयानुसार प्राप्त हुए पदार्थोंसे यज्ञ करना चाहिये। पवित्र पशुओं और मूल-फलोंसे भी यज्ञ किया जा सकता है। मेरे देखनेमें तो ऐसा लगता है कि हिंसा यज्ञका स्वभाव ही है। इसी प्रकार तारक आदि मन्त्रोंके ज्ञाता उग्रतपस्वी महर्षियोंने हिंसासूचक मन्त्रोंको उत्पन्न किया है। उसीको प्रमाण मानकर मैंने ऐसी बात कही है, अतः आपलोग मुझे क्षमा कीजियेगा। द्विजवरो! यदि आप लोगोंको वेदोंके मन्त्रवाक्य प्रमाणभूत प्रतीत होते हों तो यही कीजिये, अन्यथा यदि आप वेद-वचनको झूठा मानते हों तो मत कीजिये।' वसुद्वारा ऐसा उत्तर पाकर महर्षियोंने अपनी बुद्धिसे विचार किया और अवश्यम्भावी विषयको जानकर राजा वसुको विमानसे नीचे गिर जानेका तथा पातालमें प्रविष्ट होनेका शाप दे दिया। ऋषियोंके ऐसा कहते ही राजा वसु रसातलमें चले गये। इस प्रकार जो राजा वसु एक दिन आकाशचारी थे, वे रसातलगामी हो गये। ऋषियोंके शापसे उन्हें पातालचारी होना पड़ा। धर्मविषयक संशयोंका निवारण करनेवाले राजा वसु इस प्रकार अधोगतिको प्राप्त हुए॥ १९–२६॥
तस्मान्न वाच्यो ह्येकेन बहुज्ञेनापि संशयः।<br>बहुद्वारस्य धर्मस्य सूक्ष्मा दुरनुगा गतिः॥ २७इसलिये बहुज्ञ (अत्यन्त विद्वान्) होते हुए भी अकेले किसी धार्मिक संशयका निर्णय नहीं करना चाहिये; क्योंकि अनेक द्वार (मार्ग-) वाले धर्मकी गति अत्यन्त सूक्ष्म