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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 526 of 1098

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Page 526
५१६* मत्स्यपुराण *
श्लोकअर्थ
त्रिंशद् यानि तु वर्षाणि दिव्यो मासस्तु स स्मृतः।<br>मानुषाणां शतं यच्च दिव्या मासास्त्रयस्तु वै।<br>तथैव सह संख्यातो दिव्य एष विधिः स्मृतः॥ ११<br>त्रीणि वर्षशतान्येवं षष्टिवर्षांस्तथैव च।<br>दिव्यः संवत्सरो ह्येष मानुषेण प्रकीर्तितः॥ १२<br>त्रीणि वर्षसहस्राणि मानुषेण प्रमाणतः।<br>त्रिंशदन्यानि वर्षाणि स्मृतः सप्तर्षिवत्सरः॥ १३<br>नव यानि सहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि च।<br>वर्षाणि नवतिश्चैव ध्रुवसंवत्सरः स्मृतः॥ १४<br>षट्त्रिंशत् तु सहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि च।<br>षष्टिश्चैव सहस्राणि संख्यातानि तु संख्यया।<br>दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु प्राहुः संख्याविदो जनाः॥ १५<br>इत्येतद् ऋषिभिर्गीतं दिव्यया संख्यया द्विजाः।<br>दिव्येनैव प्रमाणेन युगसंख्या प्रकल्पिता॥ १६<br>चत्वारि भारते वर्षे युगानि ऋषयोऽब्रुवन्।<br>कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चैवं चतुर्युगम्॥ १७<br>पूर्वं कृतयुगं नाम ततस्त्रेताभिधीयते।<br>द्वापरं च कलिश्चैव युगानि परिकल्पयेत्॥ १८<br>चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम्।<br>तस्य तावच्छती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः॥ १९<br>इतरेषु ससंध्येषु ससंध्यांशेषु च त्रिषु।<br>एकपादे निवर्तन्ते सहस्राणि शतानि च॥ २०<br>त्रेता त्रीणि सहस्राणि युगसंख्याविदो विदुः।<br>तस्यापि त्रिशती संध्या संध्यांशः संख्यया समः॥ २१<br>द्वे सहस्त्रे द्वापरं तु संध्यांशौ तु चतुःशतम्।<br>सहस्त्रमेकं वर्षाणां कलिरेव प्रकीर्तितः।<br>द्वे शते च तथान्ये च संध्यासंध्यांशयोः स्मृते॥ २२<br>एषा द्वादशसाहस्री युगसंख्या तु संज्ञिता।<br>कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुष्टयम्॥ २३<br>तत्र संवत्सराः सृष्टा मानुषास्तान् निबोधत।<br>नियुतानि दश द्वे च पञ्च चैवात्र संख्यया।<br>अष्टाविंशत्सहस्राणि कृतं युगमथोच्यते॥ २४<br>प्रयुतं तु तथा पूर्णं द्वे चान्ये नियुते पुनः।<br>षण्णवतिसहस्राणि संख्यातानि च संख्यया।<br>त्रेतायुगस्य संख्येषा मानुषेण तु संज्ञिता॥ २५तीस मानवीय वर्षोंका एक दिव्य मास बतलाया जाता है। इसी प्रकार सौ मानवीय वर्षोंका तीन दिव्य मास माना गया है। यह दिव्य गणनाकी विधि कही जाती है। मानुषगणनाके अनुसार तीन सौ साठ वर्षोंका एक दिव्य (देव)-वर्ष कहा गया है। मानुषगणनाके अनुसार तीन हजार तीस वर्षोंका एक सप्तर्षि-वर्ष होता है। नौ हजार नब्बे मानुष-वर्षोंका एक 'ध्रुव-संवत्सर' कहलाता है। छियानबे हजार मानुषवर्षोंका एक हजार दिव्य वर्ष होता है—ऐसा गणितज्ञ लोग कहते हैं। द्विजवरो! इस प्रकार ऋषियोंद्वारा दिव्य गणनाके अनुसार यह गणना बतलायी गयी है। इसी दिव्य प्रमाणके अनुसार युग-संख्याकी भी कल्पना की गयी है। ऋषियोंने इस भारतवर्षमें चार युग बतलाये हैं। उन चारों युगोंके नाम हैं—कृत, त्रेता, द्वापर और कलि। इनमें सर्वप्रथम कृतयुग, तत्पश्चात् त्रेता, तब द्वापर और 'कलियुग आनेकी परिकल्पना की गयी है। उनमें कृतयुग चार हजार (दिव्य) वर्षोंका बतलाया जाता है। इसी प्रकार चार सौ वर्षोंकी उसकी संध्या और चार सौ वर्षोंका संध्यांश होता है। इसके अतिरिक्त संध्या और संध्यांशसहित अन्य तीनों युगोंमें हजारों और सैकड़ोंकी संख्यामें एक चतुर्थांश कम हो जाता है॥ १०-२०॥<br><br>इस प्रकार युगसंख्या-ज्ञाता लोग त्रेताका प्रमाण तीन हजार वर्ष, उसकी संध्याका प्रमाण तीन सौ वर्ष और संध्याके बराबर ही संध्यांशका प्रमाण तीन सौ वर्ष बतलाते हैं। द्वापरका प्रमाण दो हजार वर्ष और उसकी संध्या तथा संध्यांशका प्रमाण दो-दो सौ अर्थात् चार सौ वर्षोंका होता है। कलियुग एक हजार वर्षोंका बतलाया गया है तथा उसकी संध्या और संध्यांश मिलकर दो सौ वर्षोंके होते हैं। इस प्रकार कृतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—ये चार युग होते हैं और इनकी काल-संख्या बारह हजार दिव्य वर्षोंकी बतायी गयी है। अब मानुषवर्षके अनुसार इन युगोंमें कितने वर्ष होते हैं, उसे सुनिये। इनमें कृतयुग सत्रह लाख