मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण
Matsya Purana
by महर्षि वेदव्यास
DevanagariHindipublished1,098 pages
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| २७४ | * मत्स्यपुराण * |
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| हुताशनसुताः सर्वा भवन्त्योऽप्सरसः पुरा।<br>अप्रणम्यावलेपेन परिपृष्टः स योगवित्।<br>कथं नारायणोऽस्माकं भर्ता स्यादित्युपादिश॥ २१<br><br>तस्माद् वरप्रदानं वः शापश्चायमभूत् पुरा।<br>शय्याद्वयप्रदानेन मधुमाधवमासयोः॥ २२<br><br>सुवर्णोपस्करोत्सर्गाद् द्वादश्यां शुक्लपक्षतः।<br>भर्ता नारायणो नूनं भविष्यत्यन्यजन्मनि॥ २३<br><br>यदकृत्वा प्रणामं मे रूपसौभाग्यमत्सरात्।<br>परिपृष्टोऽस्मि तेनाशु वियोगो वो भविष्यति।<br>चौरैरपहताः सर्वा वेश्यात्वं समवाप्स्यथ॥ २४<br><br>एवं नारदशापेन केशवस्य च धीमतः।<br>वेश्यात्वमागताः सर्वा भवन्त्यः काममोहिताः।<br>इदानीमपि यद् वक्ष्ये तच्छृणुध्वं वराङ्गनाः॥ २५<br><br>पुरा देवासुरे युद्धे हतेषु शतशः सुरैः।<br>दानवासुरदैत्येषु राक्षसेषु ततस्ततः॥ २६<br><br>तेषां व्रातसहस्राणि शतान्यपि च योषिताम्।<br>परिणीतानि यानि स्युर्बलाद् भुक्तानि यानि वै।<br>तानि सर्वाणि देवेशः प्रोवाच वदतां वरः॥ २७<br><br>इन्द्र उवाच<br><br>वेश्याधर्मेण वर्तध्वमधुना नृपमन्दिरे।<br>भक्तिमत्यो वरारोहास्तथा देवकुलेषु च॥ २८<br><br>राजानः स्वामिनस्तुल्याः सुता वापि च तत्समाः।<br>भविष्यति च सौभाग्यं सर्वासामपि शक्तितः॥ २९<br><br>यः कश्चिच्छुल्कमादाय गृहमेष्यति वः सदा।<br>निधनेनोपचार्यो वः स तदान्यत्र दाम्भिकात्॥ ३०<br><br>देवतानां पितॄणां च पुण्याहे समुपस्थिते।<br>गोभूहिरण्यधान्यानि प्रदेयानि स्वशक्तितः।<br>ब्राह्मणानां वरारोहाः कार्याणि वचनानि च॥ ३१<br><br>यच्चाप्यन्यद् व्रतं सम्यगुपदेक्ष्याम्यहं ततः।<br>अविचारेण सर्वाभिरनुष्ठेयं च तत् पुनः॥ ३२<br><br>संसारोत्तारणायालमेतद् वेदविदो विदुः। | उस समय तुमलोग गर्ववश उन्हें प्रणाम न कर उन योगवेत्तासे इस प्रकार प्रश्न कर बैठीं—'देवर्षे! भगवान् नारायण किस प्रकार हमलोगोंके पति हो सकते हैं, इसका उपाय बतलाइये।' उस समय तुमलोगोंको नारदजीसे वरदान और शाप दोनों प्राप्त हुए थे। (उन्होंने कहा था—) 'यदि तुमलोग चैत्र और वैशाखमासमें शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके दिन स्वर्णनिर्मित उपकरणोंसहित दो शय्याएँ प्रदान करोगी तो निश्चय ही दूसरे जन्ममें भगवान् नारायण तुमलोगोंके पति होंगे। साथ ही सुन्दरता और सौभाग्यके अभिमानवश जो तुमलोगोंनें मुझे बिना प्रणाम किये ही मुझसे प्रश्न किया है, इस कारण तुमलोगोंका उनसे शीघ्र ही वियोग भी हो जायगा तथा डाकू तुमलोगोंका अपहरण कर लेंगे और तुम सभी कुधर्मको प्राप्त हो जाओगी।' इस प्रकार नारदजी एवं बुद्धिमान् भगवान् केशवके शापसे तुम सभी कामसे मोहित होकर कुधर्मको प्राप्त हो गयी हो। सुन्दरियो! इस समय मैं जो कुछ कह रहा हूँ, उसे भी तुमलोग ध्यान देकर सुनो। पूर्वकालमें घटित हुए सैकड़ों देवासुर-संग्रामोंमें देवताओंने समय-समयपर बहुत-से दानवो, असुरों, दैत्यों और राक्षसोंको मार डाला था, उनकी जो सैकड़ों-हजारों यूथ-की-यूथ पत्नियाँ थीं, जिन्हें अन्य राक्षसोंने बलपूर्वक (इसी प्रकार) ब्याह लिया था, उन सबसे वक्ताओंमें श्रेष्ठ देवराज इन्द्रने कहा॥ २०—२७॥<br><br>**इन्द्र बोले—**भक्तिमती सुन्दरियो! तुमलोगोंको दाम्भिकोंसे सदा दूर रहना चाहिये। तुमलोगोंको देवताओं एवं पितरोंके पुण्य-पर्व आनेपर अपनी शक्तिके अनुसार गौ, पृथ्वी, स्वर्ण और अन्न आदिका दान करना तथा ब्राह्मणोंकी आज्ञाका पालन करना चाहिये। इसके अतिरिक्त मैं तुमलोगोंको जिस दूसरे व्रतका उपदेश दे रहा हूँ, उसका भी बिना आगा-पीछा सोचे तुम सभीको अनुष्ठान करना चाहिये। यह व्रत तुमलोगोंका संसारसे उद्धार करनेमें समर्थ है। इसे वेदवेत्तालोग ही जानते हैं॥ २८—३३ ½ ॥ |