Skip to content
SarvaKosh
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 118 of 1098

Read in context
Page 118

१०८
* मत्स्यपुराण *


सत्ताईसवाँ अध्याय

देवयानी और शर्मिष्ठाका कलह, शर्मिष्ठाद्वारा कुएँमें गिरायी गयी देवयानीको ययातिका निकालना और देवयानीका शुक्राचार्यके साथ वार्तालाप

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
शौनक उवाच<br>कृतविद्ये कचे प्राप्ते हृष्टरूपा दिवौकसः।<br>कचादवेत्य तां विद्यां कृतार्था भरतर्षभ॥ १<br>सर्व एव समागम्य शतक्रतुमथाब्रुवन्।<br>कालस्त्वद्विक्रमस्याद्य जहि शत्रून् पुरंदर॥ २<br>एवमुक्तस्तु सह तैस्त्रिदशैर्मघवांस्तदा।<br>तथेत्युक्त्वोपचक्राम सोऽपश्यद् विपिने स्त्रियः॥ ३<br>क्रीडन्तीनां तु कन्यानां वने चैत्ररथोपमे।<br>वायुर्भूतः स वस्त्राणि सर्वाण्येव व्यमिश्रयत्॥ ४<br>ततो जलात् समुत्तीर्य ताः कन्याः सहितास्तदा।<br>वस्त्राणि जगृहुस्तानि यथा संस्थान्यनेकशः॥ ५<br>तत्र वासो देवयान्याः शर्मिष्ठा जगृहे तदा।<br>व्यतिक्रममजानन्ती दुहिता वृषपर्वणः॥ ६<br>ततस्तयोर्मिथस्तत्र विरोधः समजायत।<br>देवयान्याश्च राजेन्द्र शर्मिष्ठायाश्च तत्कृते॥ ७शौनकजी कहते हैं— भरतर्षभ! जब कच मृतसंजीवनी-विद्या सीखकर आ गये, तब देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे कचसे उस विद्याको पढ़कर कृतार्थ हो गये। फिर सबने मिलकर इन्द्रसे कहा—'पुरंदर! अब आपके लिये पराक्रम करनेका समय आ गया है, अपने शत्रुओंका संहार कीजिये।' संगठित होकर आये हुए देवताओंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर इन्द्र 'बहुत अच्छा' कहकर भूलोकमें आये। वहीं एक वनमें उन्होंने बहुत-सी स्त्रियोंको देखा। वह वन चैत्ररथ* नामक देवोद्यानके समान मनोहर था। उसमें वे कन्याएँ जलक्रीड़ा कर रही थीं। इन्द्रने वायुका रूप धारण करके उनके सारे कपड़े परस्पर मिला दिये। तब वे सभी कन्याएँ एक साथ जलसे निकलकर अपने-अपने अनेक प्रकारके वस्त्र, जो निकट ही रखे हुए थे, लेने लगीं। उस सम्मिश्रणमें शर्मिष्ठाने देवयानीका वस्त्र ले लिया। शर्मिष्ठा वृषपर्वाकी पुत्री थी। दोनोंके वस्त्र मिल गये हैं, इस बातका उसे पता न था। राजेन्द्र! वस्त्रोंकी उस अदला-बदलीको लेकर देवयानी और शर्मिष्ठा—दोनोंमें वहाँ परस्पर बड़ा भारी विरोध खड़ा हो गया॥ १—७॥
देवयान्युवाच<br>कस्माद् गृह्णासि मे वस्त्रं शिष्या भूत्वा ममासुरि।<br>समुदाचारहीनाया न ते श्रेयो भविष्यति॥ ८देवयानी बोली— अरी दानवकी बेटी! मेरी शिष्या होकर तू मेरा वस्त्र कैसे ले रही है? तू सज्जनोंके उत्तम आचारसे शून्य है, अतः तेरा भला न होगा॥ ८॥
शर्मिष्ठोवाच<br>आसीनं च शयानं च पिता ते पितरं मम।<br>स्तौति पृच्छति चाभीक्ष्णं नीचस्थः सुविनीतवत्॥ ९<br>याचतस्त्वं च दुहिता स्तुवतः प्रतिगृह्णतः।<br>सुताहं स्तूयमानस्य ददतो न तु गृह्णतः॥ १०शर्मिष्ठाने कहा— अरी! मेरे पिता बैठे हों या सो रहे हों, उस समय तेरा पिता विनयशील सेवकके समान नीचे खड़ा होकर बार-बार वन्दीजनोंकी भाँति उनकी स्तुति करता है। तू भिखमंगेकी बेटी है, तेरा बाप स्तुति करता और दान लेता है। मैं उनकी बेटी हूँ, जिनकी स्तुति की जाती है, जो दूसरोंको दान देते हैं और स्वयं किसीसे कुछ भी नहीं लेते।

* जैसे इन्द्रके वनका नाम नन्दन है, वैसे वरुणका उद्यान चैत्ररथ है।