Skip to content
SarvaKosh
मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

Report a copyright issue

DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1093 of 1098

Read in context
Page 1093

* अध्याय २९१ *

१०८३


| संक्रान्तिस्नपनं तद्वद् विभूतिद्वादशीव्रतम्।<br>षष्टिव्रतानां माहात्म्यं तथा स्नानविधिक्रमः॥ १५<br>प्रयागस्य तु माहात्म्यं सर्वतीर्थानुकीर्तनम्।<br>ऐलाश्रमव्रतं तद्वद् द्वीपलोकानुकीर्तनम्॥ १६<br>सूर्यचन्द्रगतिस्तद्वदादित्यरथवर्णनम् ।<br>तथान्तरिक्षचारश्च ध्रुवमाहात्म्यमेव च॥ १७<br>भुवनानि सुरेन्द्राणां त्रिपुराघोषणं तथा।<br>पितृपिण्डदमाहात्म्यं मन्वन्तरविनिर्णयः॥ १८<br>वज्राङ्गस्य तु सम्भूतिस्तारकोत्पत्तिरेव च।<br>तारकासुरमाहात्म्यं ब्रह्मदेवानुमन्त्रणम्॥ १९<br>पार्वतीसम्भवस्तद्वत् तथा शिवतपोवनम्।<br>अनङ्गदेहदाहस्तु रतिशोकस्तथैव च॥ २०<br>गौरीतपोवनं तद्वद् विश्वनाथप्रसादनम्।<br>पार्वतीऋषिसंवादस्तथैवोद्वाहमङ्गलम् ॥ २१<br>कुमारसम्भवस्तद्वत् कुमारविजयस्तथा।<br>तारकस्य वधो घोरो नरसिंहोपवर्णनम्॥ २२<br>पद्मोद्भवविसर्गस्तु तथैवान्धकघातनम्।<br>वाराणस्यास्तु माहात्म्यं नर्मदायास्तथैव च॥ २३<br>प्रवरानुक्रमस्तद्वत् पितृगाथानुकीर्तनम्।<br>तथोभयमुखीदानं दानं कृष्णाजिनस्य च॥ २४<br>तथा सावित्र्युपाख्यानं राजधर्मास्तथैव च।<br>यात्रानिमित्तकथनं स्वप्नमाङ्गल्यकीर्तनम्॥ २५<br>वामनस्य तु माहात्म्यं तथैवाथ वराहजम्।<br>क्षीरोदमथनं तद्वत् कालकूटाभिशासनम्॥ २६<br>देवासुरविमर्दश्च वास्तुविद्यास्तथैव च।<br>प्रतिमालक्षणं तद्वद् देवताराधनं ततः॥ २७<br>प्रासादलक्षणं तद्वन्मण्डपानां तु लक्षणम्।<br>भविष्यद्राजनिर्देशो महादानानुकीर्तनम्।<br>कल्पानुकीर्तनं तद्वद् ग्रन्थानुक्रमणी तथा॥ २८ | उसी प्रकार संक्रान्तिस्नपनव्रत, विभूतिद्वादशीव्रत, साठ व्रतोंका माहात्म्य, स्नानविधिका क्रम, प्रयागका माहात्म्य, समस्त तीर्थोंका वर्णन, ऐलाश्रमव्रत, द्वीप और लोकोंका कथन, सूर्य और चन्द्रमाकी गतिका वर्णन, आदित्यके रथका वर्णन, उसका अन्तरिक्षमें गमन, ध्रुवका माहात्म्य, सुरेन्द्रोंके भुवन, त्रिपुरके प्रति घोषणा, पितरोंके पिण्डदानका माहात्म्य, मन्वन्तरोंका निर्णय, वज्राङ्गकी उत्पत्ति, तारककी उत्पत्ति, तारकासुरकी प्रशंसा, ब्रह्मा और देवताओंकी मन्त्रणा, पार्वतीकी उत्पत्ति, शिवका तपोवन-गमन, कामदेवके शरीरका दाह, रतिका शोक, पार्वतीका तपोवन-गमन, विश्वनाथकी प्रसन्नता, पार्वती और सप्तर्षियोंका संवाद, पार्वतीका विवाहोत्सव, कुमार स्कन्दकी उत्पत्ति, कुमारकी विजय, तारकासुरका भयंकर वध, नरसिंहावतारका वर्णन, पद्मोद्भवका विसर्ग, अन्धकासुरका वध, वाराणसीका माहात्म्य, नर्मदाका माहात्म्य, प्रवरोंका अनुक्रम, पितृगाथाका वर्णन, उभयमुखी दान तथा कृष्णमृगचर्मके दानका वर्णन, सावित्रीका उपाख्यान, राजधर्मका वर्णन, यात्राके निमित्तका कथन, शुभ-अशुभ स्वप्नों और शकुनोंका निरूपण, वामनका माहात्म्य, वराहका माहात्म्य, क्षीरसागरका मन्थन, कालकूटका दमन, देवों और असुरोंका संग्राम, वास्तुविद्याका कथन, प्रतिमाओंके लक्षण, देवताओंकी आराधना, प्रासादोंका लक्षण, मण्डपोंका लक्षण, भविष्यत्कालीन राजाओंका वर्णन, महादानोंका कथन, कल्पोंका वर्णन तथा ग्रन्थोंकी अनुक्रमणिकाका कथन हुआ है॥ १५–२८॥ |
| एतत् पवित्रमायुष्यमेतत् कीर्तिविवर्धनम्।<br>एतत् पवित्रं कल्याणं महापापहरं शुभम्॥ २९ | यह पुराण परम पवित्र, आयु प्रदान करनेवाला, कीर्तिवर्धक, परम पावन, कल्याणकारक, बड़े-बड़े पापोंको नष्ट करनेवाला और मङ्गलमय है। इस पुराणसे मनुष्योंको |
| अस्मात् पुराणात् सुकृतं नराणां तीर्थावलीनामवगाहनानाम् ।<br>समस्तधर्माचरणोद्भवानां सदैव लाभश्च महाफलानाम्॥ ३० | सदैव पुण्य तथा समस्त तीर्थोंमें स्नान करने और सम्पूर्ण धर्माचरणसे उत्पन्न हुए महान् फलोंका लाभ प्राप्त होता है। |