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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1073 of 1098

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Page 1073

* अध्याय २८० * १०६३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्वं सर्वदेवगणमन्दिरमङ्गभूता<br>विश्वेश्वरि त्रिपथगोदधिपर्वतानाम्।<br>त्वद्दानशस्त्रशकलीकृतपातकौघः<br>प्राप्तोऽस्मि निर्वृतिमतीव परां नमामि॥ ११<br><br>लोके यथेप्सितफलार्थविधायिनीं त्वां<br>आसाद्य को हि भवदुःखमुपैति मर्त्यः।<br>संसारदुःखशमनाय यतस्व कामं<br>त्वां कामधेनुमिति वेदविदो वदन्ति॥ १२<br><br>आमन्त्र्य शीलकुलरूपगुणान्विताय<br>विप्राय यः कनकधेनुमिमां प्रदद्यात्।<br>प्राप्नोति धाम स पुरन्दरदेवजुष्टं<br>कन्यागणैः परिवृतः पदमिन्दुमौलेः॥ १३तत्पश्चात् इस प्रकार प्रार्थना करे—'विश्वेश्वरि! तुम सभी देवताओंकी आश्रयस्वरूपा तथा गङ्गा, समुद्र और पर्वतोंकी अङ्गभूता हो। मेरे पापसमूह तुम्हारे दानरूप शस्त्रसे टुकड़े-टुकड़े हो गये हैं, इस कारण मैं परम संतुष्ट हो गया हूँ, अतः तुम्हें नमस्कार करता हूँ। संसारमें यथाभिलषित फल प्रदान करनेवाली तुम्हें प्राप्तकर भला कौन मनुष्य सांसारिक दुःखोंमें पड़ सकेगा। तुम सांसारिक दुःखोंको शान्त करनेके लिये पूर्णरूपसे यत्नशील होओ। इसीलिये वेदवेत्तागण तुम्हें कामधेनु कहते हैं।' इस प्रकार आमन्त्रित कर जो व्यक्ति उत्तम कुल, शील, रूप और गुणसे युक्त ब्राह्मणको इस सुवर्णनिर्मित कामधेनुको दान करता है, वह कन्यासमूहोंसे घिरा हुआ इन्द्रदेवसे सेवित स्वर्ग तथा शंकरके लोकको प्राप्त करता है॥ ८—१३॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने हिरण्यकामधेनुप्रदानविधिर्नामैकोनाशीत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २७९॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादानवर्णन-प्रसङ्गमें हिरण्यकामधेनु-दान-विधि नामक दो सौ उन्यासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७९॥


दो सौ असीवाँ अध्याय

हिरण्याश्व-दानकी विधि

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्ने कहा—
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि हिरण्याश्वविधिं परम्।<br>यस्य प्रदानाद् भुवने चानन्तं फलमश्नुते॥ १<br><br>पुण्यां तिथिंमथासाद्य कृत्वा ब्राह्मणवाचनम्।<br>लोकेशावाहनं कुर्यात् तुलापुरुषदानवत्॥ २<br><br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम्।<br>स्वल्पे त्वेकाग्निवत्कुर्याद्धेमवाजिमखं बुधः॥ ३<br><br>स्थापयेद् वेदिमध्ये तु कृष्णाजिनतिलोपरि।<br>कौशेयवस्त्रसंवीतं कारयेद्धेमवाजिनम्॥ ४<br><br>शक्तितस्त्रिपलादूर्ध्वमासहस्रपलाद् बुधः।<br>पादुकोपानहच्छत्रचामरासनभाजनैः ॥ ५<br><br>पूर्णकुम्भाष्टकोपेतं माल्येक्षुफलसंयुतम्।<br>शय्यां सोपस्करां तद्वद्धेममार्तण्डसंयुताम्॥ ६अब मैं परम श्रेष्ठ सुवर्णमय अश्वके दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिसके प्रदानसे मनुष्य भुवनमें अनन्त फलको प्राप्त करता है। किसी पुण्यतिथिके आनेपर तुलापुरुष-दानकी तरह पुण्याहवाचन कर लोकपालोंका आवाहन करे। फिर ऋत्विज्, मण्डप, पूजन-सामग्री, भूषण, आच्छादन आदिका संग्रह करे। बुद्धिमान् यजमान यदि स्वल्पवित्तवाला हो तो उसे यह हिरण्याश्व-यज्ञ एकाग्नि-विधिकी तरह करना चाहिये। उसे अपनी शक्तिके अनुरूप तीन पलसे ऊपर एक हजार पलतकके सोनेका अश्व बनवाना चाहिये और उसे रेशमी वस्त्रसे आच्छादितकर वेदीके ऊपर फैलाये गये काले मृगचर्मपर रखी हुई तिल-राशिपर स्थापित करना चाहिये। उसके निकट पादुका, जूता, छाता, चमर, आसन और पात्र तथा जलसे भरे हुए आठ कलश, पुष्प-माला, ईख और फल भी रखनेका विधान है। उसी प्रकार वहाँ स्वर्णनिर्मित सूर्य-प्रतिमासे युक्त सभी सामग्रियोंके सहित शय्या भी स्थापित करे।