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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1070 of 1098

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Page 1070

१०६० * मत्स्यपुराण *


| हेमरत्नमयैः शृङ्गैश्चामरैरुपशोभितम्।<br>पादुकोपानहच्छत्रभाजनासनसंयुतम् ॥ ८<br>गवां दशकमध्ये स्यात् काञ्चनो नन्दिकेश्वरः।<br>कौशेयवस्त्रसंवीतो नानाभरणभूषितः ॥ ९<br>लवणद्रोणशिखरे माल्येक्षुफलसंयुतः।<br>कुर्यात् पलशतादूर्ध्वं सर्वमेतदशेषतः ॥ १०<br>शक्तितः पलसाहस्रत्रितयं यावदेव तु।<br>गोशतेऽपि दशांशेन सर्वमेतत् समाचरेत् ॥ ११ | युक्त, स्वर्ण एवं रत्नमय शिखरोंवाले चामरोंसे सुशोभित तथा पादुका, जूता, पात्र और आसनीसे संयुक्त हों। प्रति दस गौओंके बीच रेशमी वस्त्रसे परिवेष्टित, विविध अलंकारोंसे विभूषित तथा पुष्पमाला, ईख और फलोंसे संयुक्त सुवर्णमय साँड़को नन्दीके रूपमें एक द्रोण लवणके ऊपर स्थापित करना चाहिये। इन सब सामग्रियोंका निर्माण सौ पल सुवर्णसे ऊपर तीन हजार पलतक अपनी आर्थिक शक्तिके अनुसार करना चाहिये। सौ गौओंके दानमें भी इन सबका दशांशरूपसे व्यय करना चाहिये॥ १—११॥ |
| पुण्यकालं समासाद्य गीतमङ्गलनिःस्वनैः।<br>सर्वौषध्युदकस्नानस्नापितो वेदपुङ्गवैः ॥ १२<br>इममुच्चारयेन्मन्त्रं गृहीतकुसुमाञ्जलिः।<br>नमोऽस्तु विश्वमूर्तिभ्यो विश्वमातृभ्य एव च ॥ १३<br>लोकाधिवासिनीभ्यश्च रोहिणीभ्यो नमो नमः।<br>गवामङ्गेषु तिष्ठन्ति भुवनान्येकविंशतिः ॥ १४<br>ब्रह्मादयस्तथा देवा रोहिण्यः पान्तु मातरः।<br>गावो मे अग्रतः सन्तु गावः पृष्ठत एव च ॥ १५<br>गावः शिरसि मे नित्यं गवां मध्ये वसाम्यहम्।<br>यस्मात् त्वं वृषरूपेण धर्म एव सनातनः ॥ १६<br>अष्टमूर्तेरधिष्ठानमतः पाहि सनातन।<br>इत्यामन्त्र्य ततो दद्याद् गुरवे नन्दिकेश्वरम् ॥ १७<br>सर्वोपकरणोपेतं गोयुतं च विचक्षणः।<br>ऋत्विग्भ्यो धेनुमेकैकां दशैकाद् विनिवेदयेत् ॥ १८<br>गवां च शतमेकैकं तदर्धं वाथ विंशतिम्।<br>दश पञ्चाथ वा दद्यादन्येभ्यस्तदनुज्ञया ॥ १९<br>नैका बहुभ्यो दातव्या यतो दोषकरी भवेत्।<br>बह्व्यश्चैकस्य दातव्या धीमताऽऽरोग्यवृद्धये ॥ २०<br>पयोव्रतः पुनस्तिष्ठेदेकाहं गोसहस्रदः।<br>श्रावयेच्छृणुयाद् वापि महादानानुकीर्तनम् ॥ २१ | तदनन्तर पुण्यकाल आनेपर गीत एवं माङ्गलिक शब्दोंके साथ वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा सर्वौषधिमिश्रित जलसे स्नान कराया हुआ यजमान अञ्जलिमें पुष्प लेकर इस मन्त्रका उच्चारण करे—‘विश्वमूर्तिस्वरूपा विश्वमाताओंको नमस्कार है। लोकोंको धारण करनेवाली रोहिणीरूपा गौओंको बारम्बार प्रणाम है। गौओंके अङ्गोंमें इक्कीस भुवन तथा ब्रह्मादि देवताओंका निवास है, वे रोहिणीस्वरूपा* माताएँ मेरी रक्षा करें। गौएँ मेरे अग्रभागमें रहें, गौएँ मेरे पृष्ठभागमें रहें, गौएँ नित्य मेरे सिरपर वर्तमान रहें और मैं गौओंके मध्यमें निवास करूँ। सनातन! चूँकि तुम्हीं वृषरूपसे सनातन धर्म और भगवान् शिवके वाहन हो, अतः मेरी रक्षा करो!’ इस प्रकार आमन्त्रित कर बुद्धिमान् यजमान सभी सामग्रियोंके साथ एक गौ और नन्दिकेश्वरको गुरुको दान कर दे तथा उन दसों गायोंमेंसे एक-एक तथा हजार गौओंमेंसे एक-एक सौ, पचास-पचास अथवा बीस-बीस गायें प्रत्येक ऋत्विज्को समर्पित कर दे। तत्पश्चात् उनकी आज्ञासे अन्य ब्राह्मणोंको दस-दस या पाँच-पाँच गौएँ देनी चाहिये। एक ही गाय बहुतोंको नहीं देनी चाहिये; क्योंकि वह दोष-प्रदायिनी हो जाती है। बुद्धिमान् यजमानको आरोग्यवृद्धिके लिये एक-एकको अनेक गौएँ देनी चाहिये। इस प्रकार एक हजार गोदान करनेवाला यजमान एक दिनके लिये पुनः पयोव्रत करे और इस महादानका अनुकीर्तन स्वयं सुनाये अथवा सुने॥ १२—२१॥ |


* वाजसने० ८। ४१ आदिमें बार-बार रोहिणीरूपा गौओंको कामधेनु एवं सुरभिरूपा कहा गया है। रोहिणी गौ प्रायः लाल वर्णकी होती है।