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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1068 of 1098

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Page 1068

१०५८ * मत्स्यपुराण *

मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अर्धक्लृप्तसुवर्णस्य कारयेत् कल्पपादपम्।<br>गुडप्रस्थोपरिष्टाच्च सितवस्त्रयुगान्वितम्॥ ५<br>ब्रह्मविष्णुशिवोपेतं पञ्चशाखं सभास्करम्।<br>कामदेवमधस्ताच्च सकलत्रं प्रकल्पयेत्॥ ६<br>संतानं पूर्वतस्तद्वत् तुरीयांशेन कल्पयेत्।<br>मन्दारं दक्षिणे पार्श्वे श्रिया सार्धं घृतोपरि॥ ७<br>पश्चिमे पारिजातं तु सावित्र्या सह जीरके।<br>सुरभीसंयुतं तद्वत् तिलेषु हरिचन्दनम्॥ ८<br>तुरीयांशेन कुर्वीत सौम्येन फलसंयुतम्।<br>कौशेयवस्त्रसंवीतानिक्षुमाल्यफलान्वितान् ॥ ९<br>तथाष्टौ पूर्णकलशान् पादुकाशनभाजनम्।<br>दीपिकोपानहच्छत्रचामरासनसंयुतम् ॥ १०<br>फलमाल्ययुतं तद्वदुपरिष्टाद्वितानकम्।<br>तथाष्टादश धान्यानि समंतात् परिकल्पयेत्॥ ११<br>होमाधिवासनान्ते च स्नापितो वेदपुङ्गवैः।<br>त्रिः प्रदक्षिणमावृत्य मन्त्रमेतमुदीरयेत्॥ १२इसमेंसे आधे सोनेका कल्पपादप बनवाना चाहिये और उसे एक प्रस्थ गुड़के ऊपर दो श्वेत वस्त्रोंसे संयुत कर स्थापित करना चाहिये। वह कल्पवृक्ष ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सूर्यके चित्रोंसे संयुक्त पाँच शाखाओंवाला हो। उसके निचले भागमें स्त्रीसहित कामदेवके चित्रकी रचना करनी चाहिये। उसकी पूर्व दिशामें चतुर्थांशसे संतान नामक देववृक्षकी, दक्षिण दिशामें घृतके ऊपर श्रीदेवीके साथ मन्दार नामक देववृक्षकी, पश्चिम दिशामें जीराके ऊपर सावित्रीके साथ पारिजात वृक्षकी तथा उत्तर दिशामें तिलोंके ऊपर गौके साथ फलसंयुक्त हरिचन्दन वृक्षकी स्थापना करनी चाहिये। पुनः रेशमी वस्त्रसे वेष्टित, ईख, पुष्पमाला और फलोंसे संयुक्त आठ पूर्ण कलशोंको स्थापित करे, उनके निकट पादुका, भोजन-पात्र, दीप, जूता, छत्र, चामर, आसन, फल और पुष्प भी रखना चाहिये। उनके ऊपर वितान भी लगाया जाय। उनके चारों ओर अठारह प्रकारके धान्य रखे जायें। इस प्रकार हवन एवं अधिवासनकी समाप्ति होनेपर वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा स्नान कराये जानेपर यजमान तीन प्रदक्षिणा करके इस मन्त्रका उच्चारण करे॥ १—१२ ॥
नमस्ते कल्पवृक्षाय चिन्तितार्थप्रदायिने।<br>विश्वम्भराय देवाय नमस्ते विश्वमूर्तये॥ १३<br><br>यस्मात् त्वमेव विश्वात्मा ब्रह्मा स्थाणुर्दिवाकरः।<br>मूर्तामूर्तपरं बीजमतः पाहि सनातन॥ १४<br><br>त्वमेवामृतसर्वस्वमनन्तः पुरुषोऽव्ययः।<br>संतानाद्यैरुपेतस्तत् पाहि संसारसागरात्॥ १५'आप अभिलषित पदार्थको प्रदान करनेवाले कल्पवृक्ष हैं, आपको नमस्कार है। देव! आप विश्वका भरण-पोषण करनेवाले विश्वमूर्ति हैं, आपको प्रणाम है। सनातन! चूँकि आप विश्वात्मा, ब्रह्मा, शिव, दिवाकर, मूर्त-अमूर्त तथा इस चराचर विश्वके परम कारणरूप हैं, अतः मेरी रक्षा कीजिये। आप ही अमृतसर्वस्व, अनन्त, अव्यय, पुरुषोत्तम और संतान आदि दिव्य वृक्षोंसे युक्त हैं, अतः आप इस संसार-सागरसे मेरी रक्षा कीजिये।'
एवमामन्त्र्य तं दद्याद् गुरवे कल्पपादपम्।<br>चतुर्भ्यश्चाथ ऋत्विग्भ्यः संतानादीन् प्रकल्पयेत्॥ १६<br><br>स्वल्पे त्वेकाग्निवत् कुर्याद् गुरवे चाभिपूजनम्।<br>न वित्तशाठ्यं कुर्वीत न च विस्मयवान् भवेत्॥ १७इस प्रकार आमन्त्रित कर उस कल्पवृक्षको गुरुको समर्पित कर दे और संतान आदि वृक्षोंको चार ऋत्विजोंको दे दे। स्वल्प सामग्रियोंके होनेपर एकाग्निपूजनकी भाँति एक गुरुकी ही पूजा करनी चाहिये। इस दानमें न तो कृपणता करनी चाहिये और न विस्मय ही करना चाहिये।
अनेन विधिना यस्तु प्रदद्यात् कल्पपादपम्।<br>सर्वपापविनिर्मुक्तः सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ १८<br><br>अप्सरोभिः परिवृतः सिद्धचारणकिन्नरैः।<br>भूतान् भव्यांश्च मनुजांस्तारयेद् गोत्रसंयुतान्॥ १९जो मनुष्य इस विधिसे कल्पपादपका दान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करता है। वह सिद्ध, चारण, किन्नर और अप्सराओंसे घिरा हुआ अपने सगोत्रीय भूत तथा भविष्यकालमें होनेवाले पुरुषोंको तार देता है।