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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1065 of 1098

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Page 1065
* अध्याय २७६ *१०५५
अनेन विधिना यस्तु पुण्येऽहनि निवेदयेत् ।<br>हिरण्यगर्भदानं स ब्रह्मलोके महीयते ॥ २६<br>पुरेषु लोकपालानां प्रतिमन्वन्तरं वसेत् ।<br>कल्पकोटिशतं यावद् ब्रह्मलोके महीयते ॥ २७<br>कलिकलुषविमुक्तः पूजितः सिद्धसाध्यै-<br>रमरचमरमालावीज्यमानोऽप्सरोभिः ।<br>पितृशतमथ बन्धून् पुत्रपौत्रान् प्रपौत्रा-<br>नपि नरकनिमग्नांस्तारयेदेक एव ॥ २८<br>इति पठति य इत्थं यः शृणोतीह सम्यङ्-<br>मधुरिपुरिव लोके पूज्यते सोऽपि सिद्धैः ।<br>मतिमपि च जनानां यो ददाति प्रियार्थं<br>विबुधपतिजनानां नायकः स्यादमोघम् ॥ २९हो—गुरूको समर्पित कर देना चाहिये। जो मनुष्य इस प्रकारकी विधिसे पुण्यदिनको इस हिरण्यगर्भ नामक महादानको करता है, वह ब्रह्मलोकमें पूजित होता है, प्रत्येक मन्वन्तरमें लोकपालोंके पुरोंमें निवास करता है तथा सौ कोटि कल्पपर्यन्त ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। कलियुगके पापोंसे मुक्त हुआ वह अकेले ही सिद्धों और साध्योंद्वारा पूजित तथा अप्सराओं‌द्वारा देवताओंके योग्य चमरोंसे वीजित होकर नरकमें पड़े हुए सैकड़ों पितरों, बन्धुओं, पुत्रों, पौत्रों तथा प्रपौत्रोंतकको तार देता है। इस प्रकार मर्त्यलोकमें जो मनुष्य इसे पढ़ता है अथवा भलीभाँति सुनता है, वह भी विष्णुभगवान्‌की तरह सिद्धगणोंद्वारा पूजित होता है तथा जो हितैषिताकी दृष्टिसे लोगोंको दान करनेकी सूझ देता है, वह देवपतियोंका नायक होता है और उस पदसे कभी च्युत नहीं होता॥ १८—२९॥

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे महादानानुकीर्तने हिरण्यगर्भप्रदानविधिर्नाम पञ्चसप्तत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २७५ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें महादानानुकीर्तनमें हिरण्यगर्भदान-विधि नामक दो सौ पचहत्तरवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ॥ २७५॥


दो सौ छिहत्तरवाँ अध्याय

ब्रह्माण्डदानकी विधि

मत्स्य उवाचमत्स्यभगवान्‌ने कहा—
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि ब्रह्माण्डविधिमुत्तमम् ।<br>यच्छ्रेष्ठं सर्वदानानां महापातकनाशनम् ॥ १<br>पुण्यं दिनमथासाद्य तुलापुरुषदानवत् ।<br>ऋत्विङ्मण्डपसम्भारभूषणाच्छादनादिकम् ॥ २<br>लोकेशावाहनं कुर्यादधिवासनकं तथा ।<br>कुर्याद् विंशपलादूर्ध्वमासहस्त्राच्च शक्तितः ॥ ३<br>कलशद्वयसंयुक्तं ब्रह्माण्डं काञ्चनं बुधः ।<br>दिग्गजाष्टकसंयुक्तं षड्वेदाङ्गसमन्वितम् ॥ ४<br>लोकपालाष्टकोपेतं मध्यस्थितचतुर्मुखम् ।<br>शिवाच्युतार्कशिखरमुमालक्ष्मीसमन्वितम् ॥ ५अब मैं सर्वश्रेष्ठ ब्रह्माण्डदानकी विधि बतला रहा हूँ, जो सभी दानोंमें श्रेष्ठ और महापापोंका विनाश करनेवाला है। पुण्यदिनके आनेपर तुलापुरुष-दानके समान इसमें भी ऋत्विज्, मण्डप, पूजनकी सामग्री, भूषण तथा आच्छादन आदिको एकत्र करना चाहिये। इसी प्रकार लोकपालोंका आवाहन और अधिवासन भी करना चाहिये। इसके पहले बुद्धिमान् पुरुषको अपनी शक्तिके अनुसार बीस पलसे ऊपर एक हजार पलतक दो कलशोंसे संयुक्त सोनेके ब्रह्माण्डकी* रचना करवानी चाहिये। वह ब्रह्माण्ड आठों दिग्गजोंसे संयुक्त, छहों वेदाङ्गोंसे सम्पन्न तथा आठों लोकपालोंसे युक्त हो। उसके मध्यभागमें चतुर्मुख ब्रह्मा तथा शिखरपर शिव, विष्णु और सूर्य स्थित हों, वह उमा तथा लक्ष्मीसे

* ब्रह्माण्ड-निर्माण एवं दानकी ससंकल्प पूरी विधि दानसागर, दानमयूख-चन्द्रिका-कल्पतरु आदिमें है। अधिक जाननेकी इच्छा रखनेवाले सज्जनोंको इसे वहीं देखना चाहिये।