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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1062 of 1098

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Page 1062
१०५२* मत्स्यपुराण *
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पुनः प्रदक्षिण कृत्वा तुलामारोहयेद् बुधः।<br>सखड्गचर्मकवचः सर्वाभरणभूषितः॥ ६५<br><br>धर्मराजमथादाय हैमं सूर्येण संयुतम्।<br>कराभ्यां बद्धमुष्टिभ्यामास्ते पश्यन् हरेर्मुखम्॥ ६६कर पुनः प्रदक्षिणा कर तुलापर आरोहण करे। उस समय वह खड्ग, ढाल, कवच एवं सभी आभरणोंसे अलंकृत रहे। वह सुवर्णनिर्मित सूर्यसहित धर्मराजको बँधी हुई मुट्ठीवाले दोनों हाथोंसे पकड़कर विष्णुके मुखकी ओर ताकता हुआ स्थित रहे ॥ ६४—६६ ॥
ततोऽपरे तुलाभागे न्यसेयुर्द्विजपुङ्गवाः।<br>समादभ्यधिकं यावत् काञ्चनं चातिनिर्मलम्॥ ६७<br><br>पुष्टिकामस्तु कुर्वीत भूमिसंस्थं नरेश्वरः।<br>क्षणमात्रं ततः स्थित्वा पुनरेवमुदीरयेत्॥ ६८तदनन्तर ब्राह्मणोंको चाहिये कि वे तुलाकी दूसरी ओर यजमानकी तोलसे कुछ अधिक अत्यन्त निर्मल स्वर्ण रखें। पुष्टिकामी श्रेष्ठ मनुष्य जबतक स्वर्णकी तुला भूमिपर स्पर्श न कर ले, तबतक स्वर्ण रखे। फिर क्षणमात्र चुप रहकर इस प्रकार निवेदन करे—
नमस्ते सर्वभूतानां साक्षिभूते सनातनि।<br>पितामहेन देवि त्वं निर्मिता परमेष्ठिना॥ ६९<br><br>त्वया धृतं जगत् सर्वं सहस्थावरजङ्गमम्।<br>सर्वभूतात्मभूतस्थे नमस्ते विश्वधारिणि॥ ७०'सभी जीवोंकी साक्षीभूता सनातनी देवि! तुम पितामह ब्रह्माद्वारा निर्मित हुई हो, तुम्हें नमस्कार है। तुले! तुम समस्त स्थावर-जंगमरूप जगत्‌को धारण करनेवाली हो, सभी जीवोंको आत्मभूत करनेवाली विश्वधारिणि! तुम्हें नमस्कार है।'
ततोऽवतीर्य गुरवे पूर्वमर्धं निवेदयेत्।<br>ऋत्विग्भ्योऽपरमर्द्धं च दद्यादुदकपूर्वकम्॥ ७१तत्पश्चात् तुलासे उतरकर स्वर्णका आधा भाग पहले गुरुको देना चाहिये एवं बचे हुए आधे भागको हाथमें जल लेकर संकल्पपूर्वक ऋत्विजोंको दे देना चाहिये।
गुरवे ग्रामरत्नानि ऋत्विग्भ्यश्च निवेदयेत्।<br>प्राप्य तेषामनुज्ञां तु तथान्येभ्योऽपि दापयेत्॥ ७२फिर गुरुको तथा ऋत्विजोंको इसके अतिरिक्त ग्राम और रत्न भी प्रदान करना चाहिये। पुनः उनकी आज्ञा लेकर अन्य ब्राह्मणोंको भी दान करना चाहिये।
दीनानाथविशिष्टादीन् पूजयेद् ब्राह्मणैः सह।<br>न चिरं धारयेद् गेहे सुवर्णं प्रोक्षितं बुधः॥ ७३<br><br>तिष्ठेद् भयावहं यस्माच्छोकव्याधिकरं नृणाम्।<br>शीघ्रं परस्वीकरणाच्छ्रेयः प्राप्नोति मानवः॥ ७४विशेषतया दीनों एवं अनाथोंको भी ब्राह्मणोंके साथ दान देना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष उस तोले गये स्वर्णको अधिक देरतक अपने घरमें न रखे; क्योंकि यदि वह घरमें रह जाता है तो मनुष्योंको भय देनेवाला, शोक और व्याधिको बढ़ानेवाला होता है, उसे शीघ्र ही दूसरेको दे देनेसे मनुष्य श्रेयका भागी हो जाता है।
अनेन विधिना यस्तु तुलापुरुषमाचरेत्।<br>प्रतिलोकाधिपस्थाने प्रतिमन्वन्तरं वसेत्॥ ७५इस प्रकारकी विधिसे जो मनुष्य तुलापुरुषका दान देता है, वह प्रत्येक मन्वन्तरमें प्रत्येक लोकके स्वामित्व पदपर निवास करता है।
विमानेनार्कवर्णेन किङ्किणीजालमालिना।<br>पूज्यमानोऽप्सरोभिश्च ततो विष्णुपुरं व्रजेत्।<br>कल्पकोटिशतं यावत् तस्मिँल्लोके महीयते॥ ७६वह किङ्किणीसमूहोंसे युक्त एवं सूर्यके समान तेजस्वी विमानपर चढ़कर अप्सराओंसे सुपूजित हो विष्णुपुरको जाता है और उस लोकमें सौ कोटि कल्पोंतक पूजित होता है।
कर्मक्षयादिह पुनर्भुवि राजराजो<br>भूपालमौलिमणिरञ्जितपादपीठः।<br>श्रद्धान्वितो भवति यज्ञसहस्रयाजी<br>दीप्तप्रतापजितसर्वमहीपलोकः॥ ७७फिर पुण्यकर्मके क्षय होनेपर वह भूतलपर राजराजेश्वर होता है। अनेक राजाओंके मुकुटकी मणियोंसे उसका पदपीठ शोभायमान होता है, वह श्रद्धासहित सहस्रों यज्ञोंका अनुष्ठान करता है और प्रचण्ड प्रतापसे समस्त राजाओंको पराजित करता है।