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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1038 of 1098

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Page 1038

९०२८ * मत्स्यपुराण *


दो सौ उनहत्तरवाँ अध्याय

प्रासादोंके भेद और उनके निर्माणकी विधि

सूत उवाचसूतजी कहते हैं—
एवं वास्तुबलिं कृत्वा भजेत् षोडशभागिकम्।<br>तस्य मध्ये चतुर्भिस्तु भागैर्गर्भं तु कारयेत्॥ १<br><br>भागद्वादशकं सार्द्धं ततस्तु परिकल्पयेत्।<br>चतुर्दिक्षु तथा ज्ञेयं निर्गमं तु ततो बुधैः॥ २<br><br>चतुर्भागेन भित्तीनामुच्छ्रायः स्यात् प्रमाणतः।<br>द्विगुणः शिखरोच्छ्रायो भित्त्युच्छ्रायप्रमाणतः॥ ३<br><br>शिखरार्धस्य चार्धेन विधेया तु प्रदक्षिणा।<br>गर्भसूत्रद्वयं चाग्रे विस्तारो मण्डपस्य तु॥ ४<br><br>आयातः स्यात् त्रिभिर्भागैर्भद्रयुक्तः सुशोभनः।<br>पञ्चभागेन सम्भज्य गर्भमानं विचक्षणः॥ ५<br><br>भागमेकं गृहीत्वा तु प्राग्ग्रीवं कल्पयेद् बुधः।<br>गर्भसूत्रसमाद् भागादग्रतो मुखमण्डपः॥ ६<br><br>एतत् सामान्यमुद्दिष्टं प्रासादस्येह लक्षणम्।<br>तथान्यं तु प्रवक्ष्यामि प्रासादं लिङ्गमानतः॥ ७<br><br>लिङ्गपूजाप्रमाणेण कर्तव्या पीठिका बुधैः।<br>पिण्डिकार्धेन भागः स्यात् तन्मानेन तु भित्तयः॥ ८<br><br>बाह्यभित्तिप्रमाणेण उत्सेधस्तु भवेत् पुनः।<br>भित्त्युच्छायात् तु द्विगुणः शिखरस्य समुच्छ्रयः॥ ९<br><br>शिखरस्य चतुर्भागात् कर्तव्या च प्रदक्षिणा।<br>प्रदक्षिणायास्तु समस्त्वग्रतो मण्डपो भवेत्॥ १०ऋषिगणो! इस प्रकार उपर्युक्त बलि प्रदान करनेके उपरान्त वास्तु (मन्दिर)-को सोलह भागोंमें विभक्त करे। फिर उसके मध्य भागके चार भागोंको केन्द्र मानकर मध्यभागकी ओर शेष बारह भागोंमें प्रासादकी कल्पना करे। बुद्धिमान् व्यक्तिको चारों दिशाओंमें बाहर निकलनेका मार्ग भी जानना चाहिये। दीवालकी ऊँचाई वास्तुमानकी चौथाईके तुल्य होनी चाहिये और दीवालकी ऊँचाईके प्रमाणसे दूनी शिखरकी ऊँचाई होनी चाहिये। शिखरकी ऊँचाईके चौथाई मानसे प्रदक्षिणा बनानी चाहिये। मण्डपके अग्रभागका विस्तार गर्भके मानसे दूना होना चाहिये। इसकी लम्बाई तीन भागोंसे युक्त होगी, जो भद्रयुक्त और सुन्दर रहेगी। विद्वान् पुरुषको गर्भमानको पाँच भागोंमें विभक्तकर एक भागमें प्राग्ग्रीवकी कल्पना करनी चाहिये। गर्भसूत्रके समान आगे मुखमण्डपकी रचना करनी चाहिये। यह सामान्यतया सभी प्रासादोंका लक्षण बतलाया गया है। अब अन्य प्रासाद (शिवमन्दिर)-की रचनाकी विधि बतला रहा हूँ, जो लिङ्गमानके आधारपर निर्मित होता है। बुद्धिमान् पुरुषोंको लिङ्गपूजाके लिये उपयोगी पीठिका तैयार करनी चाहिये। पिण्डिकाके अर्धभागको विभक्त कर उक्त अर्धांशमानमें उसके दीवालकी रचना करनी चाहिये एवं बाहरी दीवालके प्रमाणके अनुसार उसकी ऊँचाई करनी चाहिये। दीवालकी ऊँचाईसे दूनी शिखरकी ऊँचाई होनी चाहिये। शिखरके चतुर्थ भागसे प्रदक्षिणा बनानी चाहिये। प्रदक्षिणाके बराबर मानका ही आगेका मण्डप निर्मित करना चाहिये॥ १—१०॥
तस्य चार्धेन कर्तव्यस्त्वग्रतो मुखमण्डपः।<br>प्रासादानिर्गतौ कार्यौ कपोलौ गर्भमानतः॥ ११<br><br>ऊर्ध्वं भित्त्युच्छ्रयात् तस्य मञ्जरीं तु प्रकल्पयेत्।<br>मञ्जर्याश्चार्धभागेन शुकनासां प्रकल्पयेत्॥ १२उसके आधे भागमें आगेकी ओर मुखमण्डप बनाना चाहिये। गर्भमानके अनुसार प्रासादसे बाहर निकले दो कपोलोंकी रचना करनी चाहिये। उसकी दीवालकी ऊँचाईके ऊपर मञ्जरीकी कल्पना करनी चाहिये। मंजरीके अर्धभागमें शुकनासाकी और