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मत्स्य महापुराण

मत्स्य महापुराण

Matsya Purana

by महर्षि वेदव्यास

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DevanagariHindipublished1,098 pages

Page 1030 of 1098

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Page 1030

१०२० * मत्स्यपुराण *


| गणं नन्दिमहाकालं वृषं भृङ्गिरिटिं गुहम्।<br>देवीं विनायकं चैव विष्णुं ब्रह्माणमेव च॥ ४२<br><br>रुद्रं शक्रं जयन्तं च लोकपालान् समंततः।<br>तथैवाप्सरसः सर्वा गन्धर्वगणगुह्यकान्॥ ४३<br><br>यो यत्र स्थाप्यते देवस्तस्य तान् परितः स्मरेत्।<br>आवाहयेत् तथा रुद्रं मन्त्रेणानेन यत्नतः॥ ४४<br><br>यस्य सिंहा रथे युक्ता व्याघ्रभूतास्तथोरगाः।<br>ऋषयो लोकपालाश्च देवः स्कन्दस्तथा वृषः॥ ४५<br><br>प्रियो गणो मातरश्च सोमो विष्णुः पितामहः।<br>नागा यक्षाः सगन्धर्वा ये च दिव्या नभश्चराः॥ ४६<br><br>तमहं त्र्यक्षमीशानं शिवं रुद्रमुमापतिम्।<br>आवाहयामि सगणं सपत्नीकं वृषध्वजम्॥ ४७<br><br>आगच्छ भगवन् रुद्रानुग्रहाय शिवो भव।<br>शाश्वतो भव पूजां मे गृहाण त्वं नमो नमः॥ ४८<br><br>ओं नमः स्वागतं भगवते नमः, ओं नमः सोमाय सगणाय सपरिवाराय प्रतिगृह्णातु भगवन्मन्त्रपूतमिदं सर्वमर्घ्यपाद्यामाचमनीयमासनं ब्रह्मणाभिहितं नमो नमः स्वाहा॥ ४९<br><br>ततः पुण्याहघोषेण ब्रह्मघोषैश्च पुष्कलैः।<br>स्नापयेत् तु ततो देवं दधिक्षीरघृतेन च॥ ५०<br><br>मधुशर्करया तद्वत् पुष्पगन्धोदकेन च।<br>शिवध्यानैकचित्तस्तु मन्त्रानेतानुदीरयेत्॥ ५१<br><br>यज्जाग्रतो दूरमुदेति ततो विराट्जायत इति च।<br>सहस्रशीर्षा पुरुष इति च।<br>अभि त्वा शूर नो नुम इति च।<br>पुरुष एवेदं सर्वत्रिपादूर्ध्वमिति च ।<br>येनेदं भूतमिति नत्वा वाँ अन्य इति॥ ५२<br><br>सर्वांश्रैतान् प्रतिष्ठासु मन्त्रान् जप्त्वा पुनः पुनः।<br>चतुःकृत्वः स्पृशेदद्भिर्मूले मध्ये शिरस्यपि॥ ५३ | समझना चाहिये। गण, नन्दिकेश्वर, महाकाल, वृषभ, भृङ्गिरिटि, स्वामिकार्तिक, देवी, विनायक, विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, जयन्त, लोकपाल, अप्सराओंके समूह, गन्धर्वोंके समूह और गुह्यकोंको शिवके अथवा जो देवता जिस स्थानपर स्थापित किया गया हो, उसके चारों ओर स्थापित करना चाहिये॥ ३५—४३ १/२॥<br><br>फिर इस निम्नाङ्कित मन्त्रद्वारा यत्नपूर्वक रुद्रका आवाहन करना चाहिये—'जिनके रथमें सिंह, व्याघ्र, नाग, ऋषिगण, लोकपाल-वृन्द, देव, स्कन्द, वृष, प्रिय, प्रमथगण, मातृकाएँ, चन्द्रमा, विष्णु, ब्रह्मा, सर्प, यक्ष, गन्धर्व, दिव्य आकाशचारी जीव जुते हुए हैं, उन तीन नेत्रोंवाले, ईशान, वृषध्वज, रुद्र, उमापति शिवको मैं गणों तथा पत्नीसहित आवाहन कर रहा हूँ। भगवन् रुद्र! अनुग्रह करनेके लिये आइये, कल्याणकारी होइये, शाश्वतरूपसे स्थित होइये और मेरी पूजाको ग्रहण कीजिये, आपको बारंबार नमस्कार है।' मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ नमः स्वागतं भगवते नमः, ॐ नमः सोमाय सगणाय सपरिवार प्रतिगृह्णातु भगवन् मन्त्रपूतमिदं सर्वमर्घ्यपाद्यामाचमनीयमासनं ब्रह्मणाभिहितं नमो नमः स्वाहा।' 'अर्थात्' 'ॐ भगवन्! आपका स्वागत है और आपको बारंबार नमस्कार है। ॐ गण और परिवारसहित सोमको प्रणाम है। भगवन्! आप मन्त्रद्वारा पवित्र किया हुआ तथा ब्रह्माद्वारा अभिनन्दित इस सकल अर्घ्य, पाद्य, आचमनीय और आसनको ग्रहण कीजिये। आपको बारंबार अभिवादन है। मेरे सभी पाप जल जायँ।' तदनन्तर पुण्याहवाचन एवं प्रचुर वेदध्वनिके साथ मूर्तिको दधि, क्षीर, घृत, मधु और शक्करसे स्नान कराकर पुनः पुष्प एवं सुगन्धमिश्रित जलसे स्नान कराये। उस समय एकाग्रचित्तसे भगवान् शिवका ध्यान करते हुए इन मन्त्रोंका उच्चारण करना चाहिये। वे मन्त्र इस प्रकार हैं—'यज्जाग्रतो दूरमुदेति०'—, 'ततो विराडजायत०-', 'सहस्रशीर्षा पुरुषः०-', 'अभि त्वा शूर नो नुम', 'पुरुष एवेदं सर्वम्०,-' 'त्रिपादूर्ध्वम्०-', 'येनेदं भूतम्०-', 'नत्वा वाँ अन्य०-' इति। (वाजस० सं० ३१) प्रतिष्ठासम्बन्धी कार्योंमें इन उपर्युक्त सभी मन्त्रोंको बारंबार जप करके चार बार जलसे प्रतिमाके मूलभाग, मध्यभाग तथा शिरोभागमें स्पर्श करे। |