Skip to content
SarvaKosh
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 594 of 649

Read in context
Page 594

४५४ मनुस्मृति ।
: मांस चुराने से गीध, चरबी चुराने से जलकाक, तेल की
चोरी से तैलपक पक्षी, लोन चुराने से झींगुर और दही की
चोरी से बलाका पक्षी होता है। रेशम चुराने से तीतर, अलसी
के कपड़ों की चोरी से मेंढक, कपास वस्त्र चुराने से सारस,
गौ चुराने से गोधा और गुड़ चुराने से वाग्गुद पक्षी होता है।
उत्तम सुगन्ध की चीज़ चुराने से छुछुन्दरि, पत्ते-शाक चुराने से
मोर, पक्वान्न चुराने पर भेड़िया और कच्चा अन्न चुराने से
शल्यक होता है। आग चुराने से बक, सूप-मूसल चुराने पर
मकड़ी और लाल वस्त्र चुराने से चकोर पक्षी होता है। मृगया,
हाथा चुराने से नाहर, घोड़ा चुराने से व्याघ्र, फल-मूल की
चोरी से वानर, स्त्री चुराने से रीछ, पीनेका जल चुराने से
चातक, सवारी की चोरी से ऊँट और पशु की चोरी से बकरा
होता है। मनुष्य दूसरे की कोई भी वस्तु चुराकर और बिना
होम हवि भोजन से अवश्य पक्षी होता है। स्त्रियां भी चोरी
करने पर इन्हीं दोषों को पाती हैं और उन्हीं जन्तुओं की स्त्री
बनती हैं। बिना आपत्ति के अपने अपने नित्य कर्मों से पतित
पुरुष पाप-योनियों में पैदा होकर, शत्रुओं के यहां दासपना को
पाते हैं ॥ ६३-७० ॥
वान्ताश्युल्कामुखः प्रेतो विप्रो धर्मात्स्वकाच्च्युतः ।
अमेध्यकुणपाशी च क्षत्रियः कटपूतनः ॥ ७१ ॥
मैत्राक्षज्योतिकः प्रेतो वैश्यो भवति पूयभुक् ।
चैलाशकश्च भवति शूद्रो धर्मात्स्वकाच्च्युतः ॥ ७२ ॥
यथा यथा निषेवन्ते विषयान् विषयीत्मकाः ।
तथा तथा कुशलता तेषां तेषूपजायते ॥ ७३ ॥
तेऽभ्यासात्कर्मणां तेषां पापानामल्पबुद्धयः ।
संप्राप्नुवन्ति दुःखानि तासु तास्विह योनिषु ॥ ७४ ॥