मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextबारहवां अध्याय। ४५१
ब्रह्मा विश्वसृजो धर्मो महानव्यक्तमेव च ।
उत्तमां सात्त्विकीमेतां गतिमाहुर्मनीषिणः ॥ ५० ॥
एष सर्वः समुद्दिष्टस्त्रिप्रकारस्य कर्मणः ।
त्रिविधस्त्रिविधः कृत्स्नः संसारः सार्वभौतिकः ॥ ५१ ॥
इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन धर्मस्यासेवनेन च ।
पापान् संयान्ति संसारानविद्वांसो नराधमाः ॥ ५२ ॥
यां यां योनिं तु जीवोऽयं येन येनेह कर्मणा ।
क्रमशो याति लोकेऽस्मिंस्तत्तत्सर्वं निबोधत ॥ ५३ ॥
बहून् वर्षगणान् घोरान् नरकान् प्राप्य तत्क्षयात् ।
संसारान् प्रतिपद्यन्ते महापातकिनस्त्विमान् ॥ ५४ ॥
गन्धर्व, गुह्यक, यक्ष, विद्याधर और अप्सरा ये रजोगुणी
उत्तमगति है। वानप्रस्थ, संन्यासी, ब्राह्मण, विमानचारी देवता;
नक्षत्र और दैत्य ये सत्त्वगुण की अधमगति है। यजमान, ऋषि,
देवता, वेद, ज्योति, वर्ष, पितर और साध्यदेव यह सत्त्वगुण
की मध्यमगति है। ब्रह्मा, प्रजापति, धर्म, महत्तत्त्व और प्रधान
इसको सत्त्वगुण की उत्तमगति विद्वान् लोग कहते हैं। इस
प्रकार मन, वाणी और शरीर के तीन प्रकार के कर्मों से होने
वाली, त्रिगुणमयी, उत्तम-मध्यम-अधम तीन प्रकार की सब प्रा-
णियों की गति कही गई है। इन्द्रियों में आसक्ति और धर्माचरण
न करने से मूर्ख-अधम मनुष्य पापयोनि को प्राप्त होते हैं। इस
लोक में यह जीव जिस जिस कर्म से जिस जिस योनि में
जन्म लेता है, उन सब को क्रम से सुनो—महापातकी पुरुष बहुत
वर्षों तक भयानक नरकों में पड़कर, पाप कट जाने पर बांकी
भोग भोगने के लिए इन नीच योनियों में जन्मता है ॥ ४७-५४ ॥
श्वशूकरखरोष्ट्राणां गोजाविमृगपक्षिणाम् ।