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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 585 of 649

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Page 585

बारहवां अध्याय । ४५५
तावुभौ भूतसंपृक्तौ महान् क्षेत्रज्ञ एव च ।
उच्चावचेषु भूतेषु स्थितं तं व्याप्य तिष्ठतः ॥ १४ ॥
मनुष्य मन से किए शुभाशुभ कर्मफल को मन से ही, वाणी से
किये, वाणी ही और शरीर से किए कर्म का शरीर से ही फल भो-
गता है। मनुष्य शारीरक कर्मदोषों से वृक्षादियोनि, वाणी के
कर्मदोषों से पक्षी और मृग की योनि और मानसिक कर्मदोषों
से चाण्डाल आदि हीनयोनि में जन्म पाता है। वाणी को नियम
में रखना वाग्दण्ड, मन को वश में रखना मनोदण्ड और शरीर
को वश में रखना कायदण्ड ये तीनों जिसकी बुद्धि में स्थित हैं
वह पुरुष 'त्रिदण्डी' कहाजाता है। मनुष्य संपूर्ण जीवों पर इन
तीनों दण्डों को स्थापित करने और काम-क्रोध को वश में रखने
से, सिद्धि-कृतार्थता को पाता है। जो इस शरीर को कर्म में प्रे-
रित करता है उसको 'क्षेत्रज्ञ' कहते हैं। और जो कर्म करता है
उसे 'भूतात्मा' कहते हैं। जीव नामक दूसरा अन्तरात्मा (सूक्ष्म श-
रीर) सब शरीरधारी क्षेत्रज्ञों के साथ पैदा होता है। जिससे
जन्मों में सम्पूर्ण सुख-दुःख जाना जाता है। वे दोनों महान्-सूक्ष्म
शरीर और क्षेत्रज्ञ-जीवात्मा पञ्चभूतों के साथ मिलकर ऊंचे-नीचे
प्राणियों में स्थित होकर परमात्मा के आश्रय से रहते हैं ॥ ८-१४ ॥
असंख्या मूर्त्तयस्तस्य निष्पतन्ति शरीरतः ।
उच्चावचानि भूतानि सततं चेष्टयन्ति याः ॥ १५ ॥
पञ्चभ्य एव मात्राभ्यः प्रेत्य दुष्कृतिनां नृणाम् ।
शरीरं यातनार्थीयमन्यदुत्पद्यते ध्रुवम् ॥ १६ ॥
तेनानुभूय ता यामीः शरीरेणेह यातनाः ।
तास्वेव भूतमात्रासु प्रलीयन्ते विभागशः ॥ १७ ॥
सोऽनुभूयासुखोदर्कान् दोषान् विषयसङ्गजान् ।