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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 548 of 649

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Page 548

४०८ मनुस्मृति ।
व्रात्यता बान्धवत्यागो भृत्याध्यापनमेव च ।
भृत्या चाध्ययनादानमपण्यानां च विक्रयः ॥ ६३ ॥
सर्वाकरेष्वधीकारो महायन्त्रप्रवर्तनम् ।
हिंसौषधीनां स्त्र्याजीवोऽभिचारो मूलकर्म च ॥ ६४ ॥
वेद को भूलजाना, वेद की निंदा करना, झूठी गवाही देना,
मित्र का वध करना और अभक्ष्य को खाना, ये छः मद्यपान के
समान हैं । धरोहर का मारना, मनुष्य, घोड़ा, चांदी, भूमि, हीरा
और मणि चुराना सुवर्णचोरी के माफिक है । सहोदर बहन,
कुमारी कन्या, चाण्डालिनी, मित्र और पुत्र की स्त्री से समागम
करना गुरुपत्नी के साथ समागम के समान हैं । गोहत्या करना,
व्रात्य, शूद्रों को यज्ञ कराना, परस्त्री से व्यभिचार, अपने को दास-
रूप से बेचना, योग्य गुरु को त्यागना, निर्दोष माता-पिता को
त्यागना, स्वाध्याय न करना, स्मार्त्ताग्नि को छोड़ना ये सब उप-
पातक हैं। छोटा भाई पहले विवाह करके अग्निहोत्र धारण करे
तो बड़ा भाई 'परिवित्ति' कहाता है, उस बड़े और छोटे भाई
को कन्या देना, उनको ऋत्विज् बनाना, कन्या को दूषण लगाना,
शास्त्रमर्यादा से ब्याज अधिक लेना, व्रत को तोड़ना, तालाब,
बगीचा, स्त्री और सन्तान को बेचना, समय पर संस्कार न करना,
बांधवों का पालन न करना, शिष्यों से मासिक लेकर पढ़ाना,
नौकरी देकर पढ़ना, न बेचने योग्य घी-दूध आदि बेचना, सोने
की खानों पर राजाज्ञा से अधिकारी होना, बड़े यन्त्र-कलों का
चलाना, हरी जड़ी बूटियों को काटना, स्त्री से जीविका करना,
अभिचार करना और वशीकरण करना-ये सब उपपातक हैं॥५७-६४॥
इन्धनार्थमशुष्काणां द्रुमाणामवपातनम् ।
आत्मार्थं च क्रियारम्भो निन्दितान्नादनं तथा ॥ ६५ ॥
अनाहिताग्निता स्तेयमृणानामनपक्रिया ।
असच्छास्त्राधिगमनं कौशीलव्यस्य च क्रिया ॥ ६६ ॥