मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextग्यारहवां अध्याय । ३६६
दक्षिणा के साथ अन्न देना और दूसरों को यज्ञ वेदी के बाहर
पकाया अन्न देना कहा है। राजा यज्ञ-दक्षिणा में उत्तम वस्तुओं
को योग्यता के अनुसार देवे। जो विवाहित पुरुष भीख मांगकर
दूसरा विवाह करता है उसको रतिमात्र फल है और उसकी
सन्तान द्रव्य देनेवाले की होती है। जो लोग विरक्त-वेदज्ञ-ब्रा-
ह्मणों को यथाशक्ति दक्षिणा देते हैं, वे स्वर्गगामी होते हैं। जिस
के पास कुटुम्बियों के निर्वाहार्थ तीन साल तक का या अधिकं
अन्न हो, वह सोमयाग करने योग्य होता है ॥ १-७ ॥
अतः स्वल्पीयसि द्रव्ये यः सोमं पिबति द्विजः ।
स पीतसोमपूर्वोऽपि न तस्याप्नोति तत्फलम् ॥ ८ ॥
शक्तः परजने दाता स्वजने दुःखजीविनि ।
मध्वापातो विषास्वादः स धर्मप्रतिरूपकः ॥ ६ ॥
भृत्यानामुपरोधेन यत्करोत्यौर्ध्वदैहिकम् ।
तद्भवत्यसुखोदर्कं जीवितस्य मृतस्य च ॥ १० ॥
यज्ञश्चेत्प्रतिरुद्धः स्यादेकेनाङ्गेन यज्वनः ।
ब्राह्मणस्य विशेषेण धार्मिके सति राजनि ॥ ११ ॥
यो वैश्यः स्याद्बहुपशुर्हीनक्रतुरसोमपः ।
कुटुम्बात्तस्य तद् द्रव्यमाहरेद्यज्ञसिद्धये ॥ १२ ॥
आहरेत् त्रीणि वा द्वे वा कामं शूद्रस्य वेश्मनः ।
नहि शूद्रस्य यज्ञेषु कश्चिदस्ति परिग्रहः ॥ १३ ॥
इससे कम द्रव्य होने में जो द्विज सोमयाग करता है उसका
पहला सोमयज्ञ भी नहीं पूरा पड़ता। इसलिए दूसरा कभी न करे।
जो कुटुम्ब को दुःखी होते दूसरों को धन देता है, वह पहले तो
अच्छा लगता है, परन्तु परिणाम में विष के स्वाद सा भयानक
मालूम होता है। यह केवल धर्म का झूंडारूप है। कुटुम्बियों को