मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextदशवां अध्याय । ३६७
यान् सम्यगनुतिष्ठन्तो व्रजन्ति परमां गतिम् ॥ १३०॥
एष धर्मविधिः कृत्स्नश्चातुर्वर्ण्यस्य कीर्तितः ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि प्रायश्चित्तविधिं शुभम् ॥ १३१ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रणीतायां स्मृतौ
दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
धर्मज्ञ शूद्र धर्म संपादन की इच्छा से मन्त्र के विना सत्पुरुषों
के आचरण करते हुए दोष नहीं किन्तु प्रशंसा को प्राप्त होते हैं।
शूद्र जैसे जैसे सदाचार का पालन करता है वैसे वैसे लोक में
प्रशंसा पाता है और मरकर उत्तम लोक का भागी होता है।
समर्थ भी शूद्र धनसंग्रह न करे, क्योंकि शूद्र धन पाकर ब्राह्मणों
को दुःख देता है। इसप्रकार ये सब चारों वर्णों के आपत्काल
के धर्म कहे गए हैं। जो अपने अपने धर्म का भलीभांति सेवन
करते हैं वे परमगति को पाते हैं। यह चारों वर्गों की धर्मविधि
पूरी हुई। अब प्रायश्चित्त की विधि कहेंगे ॥ १२७-१३१ ॥
दशवां अध्याय समाप्त ॥