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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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Page 535

दशवां अध्याय। ३६५
भी ले लेय। क्योंकि प्रतिग्रहसे शिल श्रेष्ठहै और उञ्छ उससे भी श्रेष्ठ
माना जाता है। जो स्नातक ब्राह्मण निर्धनता से दुःख भोगता हो
वह राजा से अन्न, वस्त्र या धन मांगे यदि न दे तो उसको
त्यागदे। बिना जोता खेत, गौ, बकरा, मेढ़ा, सोना, कच्चा और
पक्का अन्न इनमें अगले अगले से पहले पहले निर्दोष माने जाते
हैं। दायभाग का दावा आदि से मिले, बेचने में मिले, विजय से
मिले, ब्याज में मिले, परिश्रम से मिले या सत्पुरुषों से दान मिले
ये सात प्रकार की धन की प्राप्ति धर्मानुकूलहै। विद्या, कारीगरी,
नौकरी, सेवा, पशुपालन, व्यापार, खेती, सन्तोष, भिक्षा और
ब्याज ये दश जीविका के साधनहैं। ब्राह्मण और क्षत्रिय आपत्ति
में भी ब्याजपर धन न दें। परन्तु धर्मार्थ किसान वगैरह को थोड़े
ब्याजपर कुछ द्रव्य दे देवे। राजा आपत्ति में भी चौथा भाग ले-
कर यदि प्रजा की पूरी रक्षा करे तो पातकों से छूट जाता है।
युद्ध करना क्षत्रिय का निजधर्म है, इसलिए युद्ध से मुँह न फेरे।
वैश्यों की शस्त्र से रक्षा करके, अपने राजकीय-कर को ग्रहण
करे ॥ ११२-११६ ॥
धान्येऽष्टमं विंशं शुल्कं विंशं कार्षापणावरम् ।
कर्मोपकरणाः शूद्राः कारवः शिल्पिनस्तथा ॥ १२० ॥
शूद्रस्तु वृत्तिमाकांक्षन् क्षत्रमाराधयेद्यदि ।
धनिनं वाप्युपाराध्य वैश्यं शूद्रो जिजीविषेत् ॥१२१॥
स्वर्गार्थमुभयार्थं वा विप्रानाराधयेत्तु सः ।
जातब्राह्मणशब्दस्य सा ह्यस्य कृतकृत्यता ॥ १२२ ॥
विप्रसेवैव शूद्रस्य विशिष्टं कर्म कीर्त्यते ।
यदतोऽन्यद्धि कुरुते तद्भवत्यस्य निष्फलम् ॥ १२३ ॥
प्रकल्प्या अस्य तैर्वृत्तिः स्वकुटुम्बाद्यथार्हतः ।
शक्तिं चावेक्ष्य दाक्ष्यं च भृत्यानां च परिग्रहम् ॥१२४॥