मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextअपसद् हैं। निषाद से शूद्रा में उत्पन्न पुत्र 'पुक्कस' जाति का और
शूद्र से निषादकन्या में कुक्कुट जाति का पुत्र होता है। इसीप्रकार
क्षत्ता से उग्रकन्या में 'श्वपाक' और वैदेह से अम्बष्ठी में 'वेण'
कहलाता है। द्विजाति अपनी सवर्णा स्त्री में उत्पन्न पुत्रों का सं-
स्कार जो न करें तो वे गायत्रीभ्रष्ट 'व्रात्य' कहलाते हैं। व्रात्य
ब्राह्मण से पापी-भूर्जकंटक उत्पन्न होते हैं, उन की आवन्त्य, वाट-
धान, पुष्पध और शैखसंज्ञा होती है। व्रात्य-क्षत्रिय से उत्पन्न
पुत्र झल्ल, मल्ल, निच्छिवि, नट, करण, खस और द्रविड़ कहलाते
हैं। व्रात्य-वैश्य से उत्पन्न पुत्र सुधन्वाचार्य, कारुष, बिजन्मा, मैत्र
और सात्वत कहलाते हैं ॥ १६-२३ ॥
व्यभिचारेण वर्णानामवेद्यावेदनेन च ।
स्वकर्मणां च त्यागेन जायन्ते वर्णसंकराः ॥ २४ ॥
संकीर्णयोनयो ये तु प्रतिलोमानुलोमजाः ।
अन्योन्यव्यतिषक्ताश्च तान् प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ २५ ॥
सूतो वैदेहकश्चैव चण्डालश्च नराधमः ।
मागधः क्षत्तृजातिश्च तथाऽयोगव एव च ॥ २६ ॥
एते षट् सदृशान्वर्णान्जनयन्ति स्वयोनिषु ।
मातृजात्यां प्रसूयन्ते प्रवरासु च योनिषु ॥ २७॥
तथा त्रयाणां वर्णानां द्वयोरात्मास्य जायते ।
आनन्तर्यात्स्वयोन्यां तु तथा बाह्येष्वपि क्रमात् ॥२८॥
ब्राह्मणादि वर्णों में आपस के व्यभिचार से, अपने सगोत्रा के
साथ विवाह न करने से और अपने वर्णाश्रम धर्मों को छोड़ने से
वर्णसङ्कर उत्पन्न होते हैं। जो सङ्कीर्णयोनि, प्रतिलोम और अनु-
लोम के परस्पर सम्बन्ध से उत्पन्न होती हैं उनको विशेषरीति से
कहते हैं:-सूत, वैदेह, चाण्डाल, मागध, क्षत्ता और आयोगव ये छः
पुरुष अपनी माता की जाति में और अपने से ऊंची जाति में जो