मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context३७२ मनुस्मृति ।
नाऽब्रह्म क्षत्रमृध्नोति नाऽक्षत्रं ब्रह्म वर्धते ।
ब्रह्मक्षत्रं च संपृक्तमिह चामुत्र वर्धते ॥ ३२२ ॥
दत्त्वा धनं तु विप्रेभ्यः सर्वदण्डसमुत्थितम्।
पुत्रे राज्यं समासृज्य कुर्वीत प्रायणं रणे ॥ ३२३ ॥
क्षत्रिय यदि ब्राह्मण को दुःख दे तो ब्राह्मण ही उनको किसी
उपाय से अपने वश में रक्खें । क्योंकि ब्राह्मणों से ही क्षत्रिय
उत्पन्न हैं। जल से अग्नि, ब्राह्मण से क्षत्रिय, पत्थर से लोहा पैदा
हुआ है। इनको पैदा करनेवाला व्यापक तेज अपने कारण में
शान्त होजाता है। ब्राह्मण की सहायता विना क्षत्रिय नहीं बढ़ता
और क्षत्रिय की सहायता विना ब्राह्मण की उन्नति नहीं होती इस
लिये दोनों मिलकर रहें तभी लोक-परलोक में वृद्धि पाते हैं ।
राजा दण्ड का सम्पूर्ण धन ब्राह्मणों को देकर और पुत्र को राज्य
समर्पण करके रण में प्राणत्याग करे ॥ ३२०-३२३॥
एवं चरन्सदा युक्तो राजधर्मेषु पार्थिवः ।
हितेषु चैव लोकस्य सर्वान् भृत्यान्नियोजयेत् ॥३२४॥
एषोऽखिलः कर्मविधिरुक्तो राज्ञः सनातनः ।
इमं कर्मविधिं विद्यात्क्रमशो वैश्यशूद्रयोः ॥ ३२५ ॥
इसप्रकार राजा सदा आचरण करके राजधर्मों का पालन करे
और लोकहित के कामों में सब कर्मचारियों को नियुक्त करे । ये
सब राजा का सनातन-कर्तव्य कहा गया है अब वैश्य और शूद्र के
कर्तव्यों को क्रम से सुनो ॥ ३२४-३२५ ॥
वैश्यस्तु कृतसंस्कारः कृत्वा दारपरिग्रहम् ।
वार्तायां नित्ययुक्तः स्यात्पशूनां चैव रक्षणे ॥ ३२६ ॥
प्रजापतिर्हि वैश्याय सृष्ट्वा परिददे पशून् ।