मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context३७० मनुस्मृति ।
दुष्टसामन्तहिंस्त्रश्च तदाग्नेयं व्रतं स्मृतम् ॥ ३१० ॥
यथा सर्वाणि भूतानि धरा धारयते समम् ।
तथा सर्वाणि भूतानि बिभ्रतः पार्थिवं व्रतम् ॥ ३११ ॥
एतैरुपायैरन्यैश्च युक्तो नित्यमतन्द्रितः ।
स्तेनान् राजा निगृह्णीयात्स्वराष्ट्रे पर एव च ॥ ३१२ ॥
जैसे वरुण अपराधियों को अपने पाशों से बाँधता है, वैसे राजा
वरुण होकर पापियों को दण्ड देवे । जैसे मनुष्य पूर्ण चन्द्रबिम्ब
को देखकर खुश होते हैं, वैसे प्रजामण्डल जिस राजा को देख
कर खुश हो वह राजा चन्द्रव्रतधारी है। पापियों पर अग्नि के
समान प्रताप रक्खे, दुष्ट मन्त्रियों को मरवा दे यह अग्निव्रत है।
जैसे पृथ्वी सर्व प्राणियों को सम-भाव से धारण करती है,
वैसे राजा भी सम-भाव से प्राणियों का पालन करे । इन सब
और दूसरे भी उपायों से बर्ताव करे और स्वराज्य या परराज्य
के चोरों को दण्ड देवे ३०८-३१२ ॥
परामप्यापदं प्राप्तो ब्राह्मणान्न प्रकोपयेत् ।
ते ह्येनं कुपिता हन्युः सद्यः सबलवाहनम् ॥ ३१३ ॥
यैः कृतः सर्वभक्ष्योऽग्निरपेयश्च महोदधिः ।
क्षयी चाप्यायितःसोमःको न नश्येत्प्रकोप्य तान्॥३१४॥
लोकानन्यान सृजेयुर्ये लोकपालांश्च कोपिताः ।
देवान्कुर्युरदेवांश्च कः क्षिएवंस्तान्समुद्ध्नुयात् ॥ ३१५॥
ब्राह्मण-माहात्म्य ।
खजाना की कमी आदि विपत्ति में पड़कर भी राजा ब्राह्मणों
को नाराज न करे क्योंकि वे लोग कुपित होकर राज्य का नाश
कर देते हैं। जिन ब्राह्मणों ने कुपित होकर अग्नि को सर्वभक्षक,