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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 504 of 649

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Page 504

३६४ मनुस्मृति ।
वे दूत उन चोरों को खाने-पीने के बहाने ब्राह्मणदर्शन के
मिस से और वीरता के काम के ढंग से राजद्वार में लाकर पक-
ड़वा दें। जो वहां पकड़े जानेकी डरसे न जावें और गुप्त राजदूतों
के साथ चालाकी करके अपने को बचाते हों, उनको राजा बला-
त्कार से पकड़ कर मित्र-जाति भाइयों सहित वध करे। गांवों में
भी जो चोरों का भोजन, उनको ठहरने का स्थान देते हैं या चोरी
का माल रखते हैं उनको भी राजा पिटवावे। चोरों के उपद्रवों में
देश और सीमा के रक्षक उदासीन रहें तो उनको भी दण्ड करे।
दान या यज्ञ से निर्वाह करनेवाला ब्राह्मण मर्यादा से भ्रष्ट हो जाय
तो उसको भी राजा दण्ड देवे। ग्राम लुटता हो, पौ तोड़ी जाती
हो, मार्ग में चोर देखने में आवें, उस समय रक्षावाले सिपाही
आदि अपराधियों के पकड़नेकी चेष्टा न करें। तो उन्हें सर्वस्वछीन
कर देश से निकाल देय । राजा के खजाना में चोरी करनेवाले
राजा की आज्ञा-भङ्ग करनेवाले, शत्रुओं में मिलेहुए मनुष्यों को
हाथ-पैर कटवा कर अनेक कठोर दण्ड देवे ॥ २६८-२७५ ॥
संधिं छित्त्वा तु ये चौर्यं रात्रौ कुर्वन्ति तस्कराः ।
तेषां छित्त्वा नृपो हस्तौ तीक्ष्णे शूले निवेशयेत् ॥२७६॥
अङ्गुलीर्ग्रन्थिभेदस्य छेदयेत्प्रथमे ग्रहे ।
द्वितीये हस्तचरणौ तृतीये वधमर्हति ॥ २७७ ॥
अग्निदान् भक्तदांश्चैव तथा शस्त्रावकाशदान् ।
संनिधातॄंश्च मोघस्य हन्याच्चौरमिवेश्वरः ॥ २७८ ॥
तडागभेदकं हन्यादप्सु शुद्धवधेन वा ।
यद्वापि प्रतिसंस्कुर्याद्दाप्यस्तूत्तमसाहसम् ॥ २७६ ॥
जो चोर रात को सेंध लगाकर चोरी करते हैं उनका हाथ काट
कर तीखी शूली पर चढ़वा दे । गांठ काटनेवाला पहली बार पकड़
जावे तो उसकी अंगुली कटवादे, दूसरी बार हाथ-पैर कटवादे,