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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 487 of 649

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Page 487

नवां अध्याय । ३४७
पितृवेश्मनि कन्या तु यं पुत्रं जनयेद्रहः ।
तं कानीनं वदेन्नाम्ना वोढुः कन्यासमुद्भवम् ॥ १७२ ॥
या गर्भिणी संस्क्रियते ज्ञाताज्ञातापि वा सती ।
वोढुः स गर्भो भवति सहोढ इति चोच्यते ॥ १७३ ॥
पुत्रों की संज्ञा ।
विवाह-संस्कार से सवर्णा स्त्री में जो पुत्र उत्पन्न होता है,
उसको औरस कहते हैं—वह मुख्य है । मृत, नपुंसक और रोगी
की स्त्री में नियोग से जो पुत्र होता है वह 'क्षेत्रज' है माता-
पिता प्रसन्नतासे जल लेकर आपत्ति में जिसको देदें । वह दत्तक
पुत्र है । जो सजातीय, गुण-दोषज्ञ और पुत्र गुणों से युक्त हो, वह
पुत्र करलिया जाय तो 'कृत्रिम' कहलाता है। जिसके घर पुत्र
पैदा हो, पर यह न मालूम हो किसका है ? वह घर में गुप्तरीति
से पैदा 'गूढोत्पन्न' जिसकी स्त्री में हो, उसका है। माता-पिता
या एकही ने जिसको त्याग दिया हो उसका जो पालन करे वह
उसका 'अपविद्ध' पुत्र कहलाता है। अपने पिता के घर, सजा-
तीय पुरुष से, एकान्त में कन्या जो पुत्र पैदा करे उसको 'कानीन'
कहते हैं। वह उस कन्या से विवाह करनेवाले का होता है। जो
ज्ञात अथवा, अज्ञात गर्भिणीके साथ विवाह किया जाय वह उसी
पति का गर्भ है और उसको 'सहोढ' कहते हैं ॥ १६६-१७३ ॥
क्रीणीयाद्यस्त्वपत्यार्थं मातापित्रोर्यमन्तिकात् ।
स क्रीतकः सुतस्तस्य सदृशोऽसदृशोऽपि वा ॥१७४॥
या पत्या वा परित्यक्ता विधवा वा स्वयेच्छया ।
उत्पादयेत्पुनर्भूत्वा स पौनर्भव उच्यते ॥ १७५ ॥
सा चेदक्षतयोनिः स्याद्गतप्रत्यागतापि वा ।
पौनर्भवेन भर्त्रा सा पुनः संस्कारमर्हति ॥ १७६ ॥