मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextनवां अध्याय। ३४३
धनं यो बिभृयाद् भ्रातुर्मृतस्य स्त्रियमेव च ॥
सोऽपत्यं भ्रातुरुत्पाद्य दद्यात्तस्यैव तद्धनम् ॥ १४६ ॥
दत्तकपुत्र अपने उत्पादक पिता के गोत्र और धन को नहीं पा
सकता। जिसका गोत्र और धन पाता है, उसी को पिण्डदान दे
सकता है। बिना नियोगविधि से पैदा पुत्र और पुत्रवाली के दे-
वर से उत्पन्न पुत्र ये दोनों पिता के धन के अधिकारी नहीं होते।
क्योंकि ये जारज और कामज हैं। नियुक्त स्त्री में भी विधान के
बिना पैदा हुआ पुत्र, पिता का धन नहीं पासकता वह पतित से
पैदा है परन्तु विधि से नियुक्त स्त्रीमें उत्पन्न पुत्र औरस पुत्र के समान
है। वह क्षेत्रवाले का बीज है-धर्म से उत्पन्न हुआ है। जो पुरुष
मृत भाई की स्त्री और उस के धन का ग्रहण करे, वह नियोग-
विधि से पुत्र पैदा करके उसको भाई का धन दे देय ॥ १४२-१४६ ॥
या नियुक्तान्यतः पुत्रं देवराद्वाप्यवाप्नुयात् ।
तं कामजमरिक्थीयं वृथोत्पन्नं प्रचक्षते ॥ १४७ ॥
एतद्विधानं विज्ञेयं विभागस्यैकयोनिषु ।
बह्वीषु चैकजातानां नानास्त्रीषु निबोधत ॥ १४८ ॥
ब्राह्मणस्यानुपूर्वेण चतस्रस्तु यदि स्त्रियः ।
तासां पुत्रेषु जातेषु विभागोऽयं विधिः स्मृतः॥ १४६॥
जो नियुक्त-स्त्री दूसरे पुरुष से पुत्र पैदा करे वह पुत्र कामज
है। पिता की सम्पत्ति के अयोग्य है। एक जाति की स्त्रियों में पैदा
हुए पुत्रों के विभाग की यह रीति है। अब एक पुरुष से अनेक
जाति की स्त्रियों में उत्पन्न पुत्रों का हिस्सा-बांट सुनो। ब्राह्मण
के यदि क्रम से चारों वर्ण की स्त्रियां हों तो उनमें पुत्र पैदा होने
पर इस प्रकार विभाग करे ॥ १४७-१४६ ॥
कीनाशो गो वृषो यानमलंकारश्च वेश्म च ।
विप्रस्योद्धारिकं देयमेकांशश्च प्रधानतः ॥ १५० ॥