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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 480 of 649

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Page 480

३४० मनुस्मृति ।
जन्मज्येष्ठेन चाह्वानं सुब्रह्मण्यास्वपि स्मृतम् ।
यमयोश्चैव गर्भेषु जन्मतॊ ज्येष्ठता स्मृता ॥ १२६॥
अपुत्रोऽनेन विधिना सुतां कुर्वीत पुत्रिकाम् ।
यदपत्यं भवेदस्यां तन्मम स्यात्स्वधाकरम् ॥ १२७॥
अनेन तु विधानेन पुरा चक्रेऽथ पुत्रिकाः ।
विवृद्ध्यर्थं स्ववंशस्य स्वयं दक्षः प्रजापतिः ॥ १२८ ॥
ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश ।
सोमाय राज्ञे सत्कृत्य प्रीतात्मा सप्तविंशतिम्॥१२६॥
जिसका जन्म पहले हुआ हो उस पुत्र का नाम लेकर, 'अमुक
का पिता यजन करता है'—ऐसा ज्योतिष्टोम में 'सुब्रह्मण्य' मन्त्र
बोलकर इन्द्र का आवाहन होता है। और दो साथ ही पैदा हुए
हों, तो भी पहला ज्येष्ठ कहलाता है। जिसके पुत्र न हो, वह कन्या-
दान के समय जामाता से नियम करे—इस कन्या से जो पुत्र
होगा वह मेरा श्राद्ध आदि करेगा। पहले दक्षप्रजापति ने अपने
वंश की वृद्धि के लिए इसी विधि से कन्या को पुत्रिका की थी।
दक्ष ने प्रसन्न होकर धर्म को दश, कश्यप को तेरह और राजा
सोम को सत्ताईस पुत्री दी थीं ॥ १२६-१२९॥
यथैवात्मा तथा पुत्रः पुत्रेण दुहिता समा ।
तस्यामात्मनि तिष्ठन्त्यां कथमन्यो धनं हरेत् ॥१३०॥
मातुस्तु यौतकं यत्स्यात्कुमारीभाग एव सः ।
दौहित्र एव च हरेदपुत्रस्याखिलं धनम् ॥ १३१ ॥
दौहित्रो ह्यखिलं रिक्थमपुत्रस्य पितुर्हरेत् ।
स एव दद्याद्द्वौ पिण्डौ पित्रे मातामहाय च ॥१३२॥