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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 468 of 649

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Page 468

३२८ मनुस्मृति ।
एकमुत्पादयेत् पुत्रं न द्वितीयं कथञ्चन ॥ ६० ॥
द्वितीयमेके प्रजनं मन्यन्ते स्त्रीषु तद्विदः ।
अनिर्वृतं नियोगार्थं पश्यन्तो धर्मतस्तयोः ॥ ६१ ॥
विधवायां नियोगार्थे निर्वृते तु यथाविधि ।
गुरुवच्च स्नुषावच्च वर्तेयातां परस्परम् ॥ ६२ ॥
यह व्यवस्था गौ, घोड़ी, दासी, ऊंटनी, बकरी, भेड़, पक्षी और
भैंस की संतति में जाननी चाहिए। इस प्रकार बीज और योनि
की प्रधानता और अप्रधानता का विषय कहा गया अब स्त्रियों का
आपद्धर्म कहा जाता है ।
स्त्रियों का आपद्धर्म, नियोग ।
बड़े भाई की स्त्री छोटे भाई को गुरुपत्नी के समान और छोटे
भाई की स्त्री बड़े भाई को पुत्रवधू के समान कही है। आपत्तिकाल
न हो अर्थात् पुत्र हो तो बड़ा भाई छोटे भाई की स्त्री के साथ
और छोटा भाई बड़े भाई की स्त्री के साथ नियोगविधि से गमन
करे तो दोनों पतित होते हैं । सन्तान न हो तो नियोग की हुई
स्त्री देवर या सपिण्डपुरुष से अभीष्ट सन्तान प्राप्त करे। विधवा
स्त्री के साथ नियोग करनेवाला शरीर में घी लगाकर मौन होकर
रात्रि में भोग करे और इस भांति एक ही पुत्र पैदा करे, दूसरा
कभी न करे। नियोगविधि के ज्ञाता कोई ऋषि एक पुत्र से नियोग
का प्रयोजन सिद्ध न होते देखकर दूसरा पुत्र पैदा करना भी
धर्म मानते हैं। शास्त्र की रीति से विधवा स्त्री में नियोग का
प्रयोजन हो जाने पर छोटा भाई बड़े भाई की स्त्री से माता
और बड़ा भाई छोटे की स्त्री से पुत्रवधू के समान बर्ताव
करे ॥ ५५-६२ ॥
नियुक्तौ यौ विधिं हित्वा वर्तेयातां तु कामतः ।
तावुभौ पतितौ स्यातां स्नुषागगुरुतल्पगौ ॥ ६३ ॥