मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextकरे। समान जाति और सकामा कन्या को दूषित करनेवाले की
अङ्गुलियां न कटावे, सिर्फ दो सौ पण दण्ड करे। कन्या ही कन्या को
अङ्गुलियों से बिगाड़े तो उस पर दो सौ पण दण्ड करे और उस
कन्या के पिता से कहकर दूना मूल्य दिलवाये और दस कोड़े लग-
वावे । यदि कोई स्त्री कन्या को अङ्गुलियों से बिगाड़े तो उसका
शिर मुड़वा कर वा दो अङ्गुलियां काटकर, गधेपर चढ़ाकर घु-
मावे। जो स्त्री अपने रूप, गुण के घमंड से पति का तिरस्कार
करके व्यभिचार करे, उसको राजा सब के सामने कुत्तों से नोच-
वावे और जो व्यभिचारी पापी हो उसको तपाये लोह के पलंग
पर सुलाकर ऊपर से काठ रखकर जलवादे ॥ ३६७-३७२ ॥
संवत्सराभिशस्तस्य दुष्टस्य द्विगुणो दमः ।
व्रात्यया सह संवासे चाण्डाल्या तावदेव तु ॥ ३७३॥
शूद्रो गुप्तमगुप्तं वा द्वैजातं वर्णमावसन् ।
अगुप्तमङ्गसर्वस्वैर्गुप्तं सर्वेण हीयते ॥ ३७४ ॥
एक वर्ष तक व्यभिचार करता रहे तो उस दुष्ट को उक्त दण्ड
दूना होना चाहिए । हीन जाति या चाण्डाली के साथ व्यभिचार
करे तो भी वही दण्ड करे । शूद्र, ब्राह्मणस्त्री से गुप्त या प्रकट व्यभि-
चार करे तो उसका अंग काटडाले, सर्वस्वहरण करे ॥ ३७३-३७४॥
वैश्यः सर्वस्वदण्डः स्यात्संवत्सरनिरोधतः ।
सहस्त्रं क्षत्रियो दण्ड्यो मौण्ड्यं मूत्रेण चार्हति ॥ ३७५॥
ब्राह्मणीं यद्यगुप्तां तु गच्छेतां वैश्यपार्थिवौ ।
वैश्यं पञ्चशतं कुर्यात्क्षत्रियं तु सहस्रिणम् ॥ ३७६ ॥
उभावपि तु तावेव ब्राह्मण्या गुप्तया सह ।
विप्लुतौ शूद्रवद्दण्ड्यौ दग्धव्यौ वा कटाग्निना ॥ ३७७॥
सहस्रं ब्राह्मणो दण्ड्यो गुप्तां विप्रां बलाद्व्रजन् ।