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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 440 of 649

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Page 440

३०० | मनुस्मृति ।

लगता । पर उसको दण्ड न करने से उसका पाप राजा को
लगता है ॥ ३११-३१६ ॥
अन्नादे भ्रूणहा मार्ष्टि पत्यौ भार्यापचारिणी ।
गुरौ शिष्यश्च याज्यश्च स्तेनो राजनि किल्बिषम्॥३१७॥
राजनिर्धूतदण्डास्तु कृत्वा पापानि मानवाः ।
निर्मलाः स्वर्गमायान्ति सन्तः सुकृतिनो यथा॥३१८॥
गर्भघाती का पाप उसके अन्न खानेवाले को, व्यभिचारिणी
स्त्री का पाप उसके पति को, शिष्य का पाप गुरु को और यज्ञ
करनेवाले का करानेवाले को क्षमा करने से लगता है। वैसेही
छोड़ने से राजा को पाप होता है। पाप करके भी राजदण्ड पाये
हुए मनुष्य स्वर्ग को जाते हैं जैसे पुण्य करने से साधु पुरुष
जाते हैं ॥ ३१७-३१८ ॥
यस्तु रज्जुं घटं कूपाद्धरेद्भिंद्याच्च यः प्रपाम् ।
स दण्डं प्राप्नुयान्माषं तच्चैत्तस्मिन् समाहरेत् ॥३१६॥
धान्यं दशभ्यः कुम्भेभ्यो हरतोऽभ्यधिकं वधः ।
शेषेऽप्येकादशगुणं दाप्यस्तस्य च तद्धनम् ॥ ३२० ॥
तथा धरिमेमेयानां शतादभ्यधिके वधः ।
सुवर्णरजतादीनामुत्तमानां च वाससाम् ॥ ३२१ ॥
पञ्चाशतस्त्वभ्यधिके हस्तच्छेदनमिष्यते ।
शेषे त्वेकादशगुणं मूल्याद्दण्डं प्रकल्पयेत् ॥ ३२२ ॥
पुरुषाणां कुलीनानां नारीणां च विशेषतः ।
मुख्यानां चैव रत्नानां हरणे वधमर्हति ॥ ३२३ ॥
जो पुरुष कूप पर से रस्सी और घड़ा चुरावे या जो पोशाला