मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context२६४ मनुस्मृति ।
सहासनमभिप्रेप्सुरुत्कृष्टस्यापकृष्टजः ।
कट्यां कृताङ्को निर्वास्यः स्फिचंचास्यावकर्त्तयेत् ॥ २८१ ॥
अवनिष्ठीवतो दर्पाद् द्वावोष्ठौ छेदयेन्नृपः ।
अवमूत्रयतो मेढ्रमवशर्धयतो गुदम् ॥ २८२ ॥
केशेषु गृह्णतो हस्ता च्छेदयेदविचारयन् ।
पादयोर्दाढिकायां च ग्रीवायां वृषणेषु च ॥ २८३ ॥
दण्डपारुष्य-मार पीट का निर्णय ।
शूद्र, द्विजों को अपने जिस अङ्ग से मारे उसी अङ्ग को कटवा
डाले यही मनुजी की आज्ञा है। हाथ, डंडा उठाकर मारे तो हाथ
और कोप से पैर से मारे तो पैर काटने योग्य है। नीच जाति
का ऊंची जातिवाले के साथ अभिमान से बैठना चाहे तो उसकी
कमर में दागकरके देश से निकाल दे। हीनवर्ण ऊंचे वर्ण के ऊपर थूके
तो दोनों ओठ कटवावे, मूते तो लिङ्ग और पादे तो गुदा कटवावे
बाल पकड़े, पैर पकड़े, घसीटे, दाढ़ी गर्दन और अण्डकोष में
हाथ लगावे तो बिना विचार झट हाथ कटवादे ॥ २७६-२८३ ॥
त्वग्भेदकः शतं दण्ड्यो लोहितस्य च दर्शकः ।
मांसभेत्ता तु षण्निष्कान्प्रवास्यस्त्वस्थिभेदकः ॥ २८४ ॥
वनस्पतीनां सर्वेषामुपभोगं यथा यथा ।
तथा तथा दमः कार्यों हिंसायामिति धारणा ॥ २८५ ॥
मनुष्याणां पशूनां च दुःखाय प्रहृते सति ।
यथा यथा महद्दुःखं दण्डं कुर्यात्तथा तथा ॥ २८६ ॥
'खाल खींचने और खून निकालने पर सौ पण दण्ड करे । मांस
काटे तो छः निष्क और हड्डी तोड़े तो देशनिकाले की सज़ा करे ।
संपूर्ण वृक्षों का उपयोग विचार कर उनके काटनेवाले को दण्ड
देवे । मनुष्य और पशुओं को मारने पर जैसा अधिक दुःख हो