मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context२८६ मनुस्मृति ।
दाता है। जो चरवाह दूध मात्र का वेतन पाता हो वह स्वामी
की आज्ञा से दश गौओं में जो उत्तम हो उसको दुह लेय। यह
बिना तनख्वाह के चरवाह की तनख्वाह है ॥ २२६-२३१ ॥
नष्टं विनष्टं कृमिभिः श्वहतं विषमे मृतम् ।
हीनं पुरुषकारेण प्रदद्यात्पाल एव तु ॥ २३२ ॥
विघुष्य तु हृतं चौरैर्न पालो दातुमर्हति ।
यदि देशे च काले च स्वामिनः स्वस्य शंसति ॥२३३॥
कर्णौ चर्म च बालांश्च बस्तिं स्नायुं च रोचनाम् ।
पशुषु स्वामिनां दद्यान्मृतेष्वङ्गानि दर्शयेत् ॥ २३४ ॥
अजाविके तु संरुद्धे वृकैः पाले त्वनायति ।
यां प्रसह्य वृको हन्यात्पाले तत्किल्बिषं भवेत् ॥२३५॥
तासां चेदवरुद्धानां चरन्तीनां मिथो वने ।
यामुत्प्लुत्य वृको हन्यान्न पालस्तत्र किल्बिषी ॥२३६॥
जो पशु खो जाय, कीड़े पड़कर मरजाय, कुत्तों से मारा जाय,
गढ़े में गिरकर मरजाय, चरवाह की असावधानी से चोर लेजायँ
तो उसको चरवाह मालिक को देवे । जो चोर हमला करके कोई
पशु लेजायँ तो चरवाह ठीक समय पर मालिक से इत्तिला करे
तो चरवाह दण्ड न देय । यदि पशु खुद मरजाय तो उसके कान,
चमड़ा, बाल, वस्ति, स्नायु और रोचना वगैरह से कोई अङ्ग
मालिक को दे देय और कोई अङ्ग दिखला दे । बकरों और भेड़
को भेंडिया घेर ले और चरवाह उनको छोड़कर भग जावे तो
जिसको मारेगा उसका पातक चरवाह को लगेगा और यदि
बकरी, भेड़ को चरवाहने घेर रक्खा हो और अचानक भेंडिया
आकर मारडाले तो चरवाह पातकी न होगा ॥ २३२-२३६ ॥
धनुःशतं परीहारो ग्रामस्य स्यात्समन्ततः ।