Skip to content
SarvaKosh
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 406 of 649

Read in context
Page 406

२६६ मनुस्मृति ।

अग्नि न जळावे, जल में न डूबे और अचानक शिर पर आपत्ति
न पड़जाय उसको शपथ में पवित्र जानना ॥ १११-११५ ॥

वत्सस्य ह्यभिशस्तस्य पुरा भ्रात्रा यवीयसा।
नाग्निर्ददाह रोमापि सत्येन जगतः स्पृशः ॥ ११६ ॥
यस्मिन्यस्मिन् विवादे तु कौटसाक्ष्यं कृतं भवेत् ।
तत्तत्कार्यं निवर्त्तेत कृतं चाप्यकृतं भवेत् ॥ ११७ ॥
लोभान्मोहाद्भयान्मैत्रात्कामात्क्रोधात्तथैव च।
अज्ञानाद्बालभावाच्च साक्ष्यं वितथमुच्यते ॥ ११८॥

पूर्व काल में वत्सऋषि के ऊपर उनके छोटे भाई ने कलङ्क
लगाया था कि तू शूद्रा के गर्भ का है। तब वत्स ने अग्नि में
प्रवेश किया था, पर सत्यवश अग्नि ने उनका एक रोम भी
नहीं जलाया। जिन जिन मुक़द्मों में झूठी गवाही दी ऐसा नि-
श्चय हो-उनको फिर से उलट कर परीक्षा करे। लोभ, मोह,
भय, मित्रता, काम, क्रोध, अज्ञान और लड़कपन से गवाही झूठी
कही जाती है ॥ ११६-११८ ॥

एषामन्यतमे स्थाने यः साक्ष्यमनृतं वदेत् ।
तस्य दण्डविशेषांस्तु प्रवक्ष्याम्यनुपूर्वशः ॥ ११९ ॥
लोभात्सहस्रं दण्ड्यस्तु मोहात्पूर्व तु साहसम् ।
भयाद्द्वौ मध्यमौ दण्डौ मैत्रात्पूर्व चतुर्गुणम् ॥ १२०॥
कामाद्दशगुणं पूर्वं क्रोधात्तु त्रिगुणं परम् ।
अज्ञानाद् द्वे शते पूर्णे बालिश्याच्छतमेव तु ॥ १२१ ॥
एतानाहुः कौटसाक्ष्ये प्रोक्तान्दण्डान्मनीषिभिः ।
धर्मस्याव्यभिचारार्थमधर्मानियमाय च ॥ १२२ ॥