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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 385 of 649

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Page 385

सातवां अध्याय। २४५
अलङ्कृतश्च संपश्येदायुधीयं पुनर्जनम् ।
वाहनानि च सर्वाणि शस्त्राण्याभरणानि च ॥२२२॥
सन्ध्यां चोपास्य शृणुयादन्तर्वेश्मनि शस्त्रभृत् ।
रहस्याख्यायिनां चैव प्रणिधीनां च चेष्टितम् ॥२२३॥
गत्वा कक्षान्तरं त्वन्यत्समनुज्ञाप्य तं जनम् ।
प्रविशेद्भोजनार्थं च स्त्रीवृतोऽन्तःपुरं पुनः ॥ २२४ ॥
भोजन करने के बाद, उसी अन्तःपुर में स्त्रियों के साथ कुछ
देर टहले, फिर यथासमय अपने राजकाज का विचार करे।
फिर शस्त्र, भूषणों से सजकर सवार, सिपाही, घोड़ा वगैरह
अस्त्र और राजकीय आभूषणों की देखभाल करे। उसके अनन्तर
सायंसंध्या करके, एकान्त में दूत और प्रतिनिधियों के समा-
चार और कामों को सुने। उन लोगों को विदा करके दूसरे कमरे
में जाकर स्त्रियों के साथ भोजनार्थ अन्तःपुर को गमन करे। वहां
यथावत् भोजन करके थोड़ा गाना, बाजा से चित्त को प्रसन्न
करके और समय पर निद्रा करे ॥ २२१—२२४ ॥
तत्र भुक्त्वा पुनः किंचित्तूर्यघोषैः प्रहर्षितः ।
संविशेत्तु यथाकालमुत्तिष्ठेच्च गतक्लमः ॥ २२५ ॥
एतद्विधानमातिष्ठेदरो‍गः पृथिवीपतिः ।
अस्वस्थः सर्वमेतत्तु भृत्येषु विनियोजयेत् ॥ २२६ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां
सप्तमोऽध्यायः ॥
प्रातःकाल कुछ सबेरे उठकर फिर अपना नित्यकर्म यथावत
करे। इस प्रकार से नीरोग राजा संपूर्ण राज्यकार्यों का स्वयं
संपादन करे। यदि शरीर में कोई क्लेश होजाय तो अपने अधिका-
रियों से सब कामों को करावे ॥ २२५—२२६ ॥
सातवाँ अध्याय पूरा हुआ।