मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context२४२ मनुस्मृति ।
प्रजाओं का भूमि कर कम करे और यह ढिंढोरा पिटावे कि
जिन्होंने हमारे साथ बुरा बर्ताव किया है उन्हें भी अभय दिया
गया। जीते राजा और मंत्री का अभिप्राय जानकर, उसी के
वंशवाले को गद्दी देकर अपनी शर्तें पक्की कर लेवे। और उनके
धर्मों को-रिवाजों को माने, रत्नों से मंत्री आदि के साथ उसका
सत्कार करे अर्थात्-खिलत देवे। यद्यपि किसी की प्रिय वस्तु
ले लेना अप्रिय और देना प्रिय होता है तौभी समयानुसार लेना
और देना दोनों अच्छा माना जाता है। ये सब कर्म दैव और
मनुष्य के पुरुषार्थ के अधीन हैं। इन में दैव का निर्णय अशक्य
है परन्तु पुरुषार्थ से कार्य किया जाता है। अर्थात् मनुष्य-साध्य-
कार्य में पुरुषार्थ प्रधान माना जाता है ॥ १६८-२०५॥
सह वापि व्रजेद्युक्तः संधिं कृत्वा प्रयत्नतः ।
मित्रं हिरण्यं भूमिं वा संपश्यंस्त्रिविधं फलम् ॥२०६॥
पाष्णिग्राहं च संप्रेक्ष्य तथाक्रन्दं च मण्डले ।
मित्रादथाप्यमित्राद्वा यात्राफलमवाप्नुयात् ॥ २०७ ॥
हिरण्यभूमिसंप्राप्त्या पार्थिवो न तथैधते ।
यथा मित्रं ध्रुवं लब्ध्वा कृशमप्यायतिक्षमम् ॥ २०८॥
अथवा राजा मित्रता या कुछ द्रव्य या भूमि शत्रु से पाकर
सुलह करके लौट आवे अर्थात् इन पदार्थों को देना शत्रु मंजूर करे
तो लेकर सुलह कर ले। जो विजय करते हुए राजा के पीछे दूसरा
राजा दबाकर चढ़ आवे उसको 'पाष्णिग्राह' कहते हैं और जो
उसको इस काम से रोके उसे 'क्रन्द' कहते हैं। इन दोनों को
देखकर, मित्र या अमित्र से यात्रा का फल ग्रहण करे । (ऐसा न
करे जिसमें ये दोनों बिगड़ जावें) राजा सुवर्ण और भूमि को
पाकर वैसा नहीं बढ़ता, जैसा दुर्बल भी स्थिर मित्र को पाकर
बढ़ता है ॥२०६-२०८ ॥
धर्मज्ञं च कृतज्ञं च तुष्टप्रकृतिमेव च ।
अनुरक्तं स्थिरारम्भं लघुमित्रं प्रशस्यते ॥ २०६ ॥