मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 380 of 649
Read in context२४० मनुस्मृति ।
प्रहर्षयेद्वलं व्यूह्य तांश्च सम्यक् परीक्षयेत् ।
चेष्टाश्चैव विजानीयादरीन् योधयतामपि ॥ १६४ ॥
उपरुध्यारिमासीत राष्ट्रं चास्योपपीडयेत् ।
दूषयेच्चास्य सततं यवसान्नोदकेन्धनम् ॥ १६५ ॥
भिन्द्याच्चैव तडागानि प्राकारपरिखास्तथा ।
समवस्कन्दयेच्चैनं रात्रौ वित्रासयेत्तथा ॥ १६६ ॥
उपजप्यानुपजपेद् बुध्येतैव च तत्कृतम् ।
युक्ते च दैवे युध्येत जयप्रेप्सुरपेतभीः ॥ १६७ ॥
कुछ सेना का हिस्सा, चतुर पुरुष की अध्यक्षता में चारों
तरफ़ से नियत करे और उनमें बाजा वगैरह का संकेत कर ले
जिसमें समय समय पर हालात मिला करें। योद्धा कमती हों तो
इकट्ठे करके युद्ध करावे, अधिक हों तो मनमानी, चारों तरफ़
फैलाकर, सूई के आकार के व्यूह से लड़ावे । समभूमि में रथ
घोड़ों से, जल में नावों से, हाथियों से, वृक्ष आदि की झाड़ियों
में बाणों से और स्थल में, ढाल तलवार वगैरह से युद्ध करे ।
कुरुक्षेत्र, मत्स्य, पञ्चाल, शूरसेन आदि देशों के ऊंचे और ठिंगने
मनुष्यों को सेना के आगे रक्खे । सेना को किसी रचना से खड़ी
करके उत्साह दिलावे और क्या क्या करने से खुशी या नाखुश
होंगे इन बातों की परीक्षा करे और शत्रुओं के मुक़ाबले दिल
से लड़ते हैं या नहीं यह चेष्टाओं से जान लेवे । शत्रु लड़े वा
न लड़े पर उसके देश को नष्ट कर के वहाँ का, अन्न, जल,
चारा, ईंधन आदि उजाड़ देवे । तालाब, क़िला, खाइयों को
तोड़ दे, शत्रु पर हमला करे और रात में अनेक आवाज़ों से
उसको डरा देवे । उसके मन्त्री आदि जो फूट सकें उनको
लालच देकर मिलाले, उनसे शत्रु की कुल हालतें जाने । और
समय अनुकूल आवे, तो निडर होकर, युद्ध करे ॥ १६०-१६७ ॥