मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
DevanagariSanskritpublished649 pages
Page 378 of 649
Read in contextPage 378२३८ : मनुस्मृति।
२३८ : मनुस्मृति।
मार्गशीर्षे शुभे मासि यायाद्यात्रां महीपतिः ।
फाल्गुनं वाथ चैत्रं वा मासौ प्रति यथाबलम् ॥१८२॥
अन्येष्वपि तु कालेषु यदा पश्येद्ध्रुवं जयम् ।
तदा यायाद्विगृह्यैव व्यसने चोत्थिते रिपोः ॥ १८३ ॥
कृत्वा विधानं मूले तु यात्रिकं च यथाविधि ।
उपगृह्यास्पदं चैव चारान् सम्यग् विधाय च ॥१८४॥
संशोध्यं विविधं मार्गं षड्विधं च बलं स्वकम् ।
सांपरायिककल्पेन यायादरिपुरं शनैः ॥ १८५ ॥
शत्रुसेविनि मित्रे च गूढे युक्ततरो भवेत् ।
गतप्रत्यागते चैव स हि कष्टतरो रिपुः ॥ १८६ ॥
राजा अपनी सेना के वलावल का विचार करके, शुभ अगहन
या फागुन के महीने में या चैत में, शत्रु के ऊपर चढ़ाई करे।
इसके सिवा दूसरे समय में भी अगर अपनी जीत देखे तब, अथवा
जब शत्रु किसी विपत्ति में फँसा हो तब चढ़ाई करे। अपने नगर
की रक्षा का प्रबन्ध करके, गुप्तदूतों को भेजकर, ऊंचा, नीचा
और सम मार्ग को साफ़ कराकर छः प्रकार की सेना * को
ठीक करके सम्पूर्ण युद्ध-सामग्री को साथ लेकर, धीरे से शत्रु
के नगर को जावे। जो मित्र छिप कर शत्रु से मिला हो, जो पहले
छुड़ाया नौकर फिर आया हो, इनसे सावधान रहे, क्योंकि ये
दोनों दुःखदायक वैरी हैं ॥ १८२-१८६ ॥
दण्डव्यूहेन तन्मार्गं यायात्तु शकटेन वा ।
- छः प्रकार के बलः- हाथीसवार, घोड़ासवार, रथसवार, पैदल, खज़ाना
और नौकर चाकर।