मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextसातवां अध्याय । २३५
से मिल कर दूसरे के ऊपर चढ़ाई का नाम 'समानकर्मा सन्धि'
है। हम इसके ऊपर चढ़ाई करेंगे, तुम दूसरे पर करो ऐसी राय
को 'असमानकर्मा सन्धि' कहते हैं। शत्रु पराजय के लिए
उचित या अनुचित काल में खुद लड़ाई करना एक, अपने मित्र
के अपकार होने से, उसकी रक्षा के लिए लड़ाई करना दूसरा, ये
दो भांति के विग्रह होते हैं। दैवयोग से, बहुत आवश्यक पड़
जाने पर अकेले या मित्र से मिलकर, शत्रु के ऊपर चढ़ाई करना
ये दो प्रकार की चढ़ाइयां कहलाती हैं ॥ १६२-१६५ ॥
क्षीणस्य चैव क्रमशो दैवात्पूर्वकृतेन वा ।
मित्रस्य चानुरोधेन द्विविधं स्मृतमासनम् ॥ १६६ ॥
बलस्य स्वामिनश्चैव स्थितिः कार्यार्थसिद्धये ।
द्विविधं कीर्त्यते द्वैधं षाड्गुण्यगुणवेदिभिः ॥ १६७ ॥
अर्थसम्पादनार्थं च पीड्यमानस्य शत्रुभिः ।
साधुषु व्यपदेशार्थं द्विविधः संश्रयः स्मृतः ॥ १६८ ॥
पूर्वजन्म के पाप से या यहीं के कुकर्मों से, धन आदि से हीन
राजा का चुप मार कर बैठना, अथवा सामर्थ्य होते भी किसी
मित्र के कहने से चुपचाप बैठा रहना, ये दो आसन कहलाते हैं।
कार्यसिद्धि के लिए कुछ सेना को एक जगह और कुछ सेना के
साथ राजा क़िले में रहे, यह दो प्रकार का द्वैध, गुणज्ञों ने कहा
है। शत्रुओं से पीड़ित राजा के संकट दूर करने के लिए अथवा
सत्पुरुषों को जनाने के लिए बली राजा का आश्रय लेना, यह दो
प्रकार का संश्रय कहलाता है ॥ १६६-१६८ ॥
यदावगच्छेदायतयामाधिक्यं ध्रुवमात्मनः ।
तदात्वे चाल्पिकां पीडां तदा सन्धिं समाश्रयेत्॥१६६॥
यदा प्रकृष्टा मन्येत सर्वास्तु प्रकृतीर्भृशम् ।