मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context२३० मनुस्मृति ।
कारूकांश्चिल्पिनश्चैव शूद्रांश्चात्मोपजीविनः ।
एकैकं कारयेत्कर्म मासि मासि महीपतिः ॥ १३८ ॥
नोच्छिन्द्यादात्मनो मूलं परेषां चातितृष्णया ।
उच्छिन्दन्ह्यात्मनोमूलमात्मानंतांश्चपीडयेत्॥१३६॥
तीक्ष्णश्चैव मृदुश्च स्यात्कार्यं वीक्ष्य महीपतिः ।
तीक्ष्णश्चैव मृदुश्चैव राजा भवति संमतः ॥ १४० ॥
राजा, इस श्रोत्रिय के वेदाध्ययन और सदाचार को जानकर
कोई धर्मविषय की जीविका बाँध दे और पिता जैसे पुत्र की रक्षा
करता है वैसे ही रक्षा करे। क्योंकि राजा से रक्षित श्रोत्रिय के धर्म-
पालन से राजा का आयुर्बल, द्रव्य और राज्य बढ़ता है । अपने
राज्य में, व्यापारवाले से भी कुछ सालाना कर दिलावे। लोहार,
बढ़ई, आदि और दासों से महीने में एक एक दिन बेगार में काम
करावे। प्रजा के स्नेह से अपना कर न लेना अपना मूलोच्छेद करना
है और लोभ से ज्यादा कर लेना प्रजाको सताना है, इसलिए राजा
ऐसा काम कभी न करे जिसमें राज्य और प्रजा दोनों को कष्ट
उठाना पड़े। राजा को कभी तीखा और कभी सीधा स्वभाव रखने
से उसको सब मानते हैं ॥ १३५-१४० ॥
अमात्यमुख्यं धर्मज्ञं प्राज्ञं दान्तं कुलोद्गतम् ।
स्थापयेदासने तस्मिन् खिन्नः कार्येक्षणे नृणाम् ॥ १४१ ॥
राजा खुद, राज्य के कार्यों को और दूसरे के कामों को देखने में
किसी कारण से असमर्थ हो तो, चतुर, धर्मात्मा, कुलीन प्रधान
मन्त्री को अपने न्यायासन पर, काम देखने के लिए नियुक्त
कर देवे ॥ १४१ ॥
एवं सर्वं विधायेदमितिकर्त्तव्यमात्मनः ।
युक्तश्चैवाप्रमत्तश्च परिरक्षेदिमाः प्रजाः ॥ १४२ ॥