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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 366 of 649

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Page 366

२२६ । मनुस्मृति ।
राष्ट्रस्य संग्रहे नित्यं विधानमिदमाचरेत् ।
सुसंगहीतराष्ट्रो हि पार्थिवः सुखमेधते ॥ ११३ ॥
जो राजा, अज्ञानवश बिना विचार, अपने राज्य को दुःख देता
है वह शीघ्र ही राज्य, जीवन और बान्धवों से भ्रष्ट होजाता है।
जैसे शरीर के शोषण से प्राणियों के प्राण घटते हैं, वैसे, राष्ट्र को
दुःख देने से, राजाओं के भी प्राण घटते हैं। राजा देश की रक्षा
के लिए, ऊपर कहे उपायों को करे क्योंकि-राज्यरक्षा से राजा
की सुखवृद्धि होती है ॥ १११-११३ ॥
द्वयोस्त्रयाणां पञ्चानां मध्ये गुल्ममधिष्ठितम् ।
तथा ग्रामशतानां च कुर्याद्राष्ट्रस्य संग्रहम् ॥ ११४ ॥
ग्रामस्याधिपतिं कुर्याद्दशग्रामपतिं तथा ।
विंशतीशं शतेशं च सहस्रपतिमेव च ॥ ११५ ॥
ग्रामदोषान् समुत्पन्नान् ग्रामिकः शनकैः स्वयम् ।
शंसेद्ग्रामदशेशाय दशेशो विंशतीशिने ॥ ११६ ॥
विंशतीशस्तु तत्सर्वं शतेशाय निवेदयेत् ।
शंसेद्ग्रामशतेशस्तु सहस्रपतये स्वयम् ॥ ११७॥
यानि राजप्रदेयानि प्रत्यहं ग्रामवासिभिः ।
अन्नपानेन्धनादीनि ग्रामिकस्तान्यवाप्नुयात् ॥ ११८॥
दो, तीन, पांच या सौ ग्रामों के बीच में, रक्षा करनेवाले पुरुषों
का एक महकमा क़ायम करे। एक गाँव का, दश का, बीस का, सौ का
और हज़ार गांव का एक-एक अधिपति नियत करे। गाँव का मालिक
गाँव के बखेड़ों को धीरे से जानकर उसका फ़ैसला करदे, या दश
गाँव के मालिक को सूचित करदे, या वह बीस गाँव के मालिक
को इत्तला करदे इत्यादि। जो अन्न, ईंधन वगैरह राजा को देनेवाले