मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
by महर्षि मनु
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextसातवां अध्याय। २२१
गुरुकुल से विद्या पढ़कर लौटे हुए ब्राह्मणों का पूजन करे, क्योंकि
इससे राजाओं को अक्षय ब्रह्म प्राप्ति होती है ॥ ७६-८३ ॥
न स्कन्दते न व्यथते न विनश्यति कर्हिचित् ।
वरिष्ठमग्निहोत्रेभ्यो ब्राह्मणस्य मुखे हुतम् ॥ ८४ ॥
समसब्राह्मणे दानं द्विगुणं ब्राह्मणब्रुवे ।
प्राधीते शतसाहस्रमनन्तं वेदपारगे ॥ ८५ ॥
पात्रस्य हि विशेषेण श्रद्धानतयैव च ।
अल्पं वा बहु वा प्रेक्ष्य दानस्यावाप्यते फलम् ॥ ८६ ॥
इस अक्षय निधि को चोर नहीं चुराते, शत्रु नहीं छीन सकते।
खोया नहीं जासकता ! इसलिए राजा, ब्राह्मणों में उस अक्षयनिधि
का स्थापन करे। अग्नि में जो हवन किया जाता है वह कभी
गिर जाता है, कभी सूख जाता है, कभी नष्ट होजाता है; पर गुरु-
कुल से आये ब्राह्मण के मुख में जो हवन किया जाता है वह अग्नि-
होत्रादि से भी श्रेष्ठ है। ब्राह्मण के सिवा दूसरी जाति को दिया दान,
मध्यम फलदायक होता है। जो अपने को ब्राह्मण कहता है उसको
दिया दान दोगुना फल, पठित ब्राह्मण को दिया लाखगुना, और
वेदविशारद ब्राह्मण को दिया दान अनन्त फलदायक होता है।
पात्र की योग्यता और श्रद्धा की न्यूनाधिकता के अनुसार दाता
को दान का फल मिलता है ॥ ८४-८६ ॥
समोत्तमाधमै राजा त्वाहूतः पालयन् प्रजाः ।
न निवर्तेत संग्रामात्क्षात्रं धर्ममनुस्मरन् ॥ ८७ ॥
संग्रामेष्वनिवर्तित्वं प्रजानां चैव पालनम् ।
शुश्रूषा ब्राह्मणानां च राज्ञां श्रेयस्करं परम् ॥ ८८ ॥
आहवेषु मिथोऽन्योन्यं जिघांसन्तो महीक्षितः ।