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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 318 of 649

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Page 318

१७८ मनुस्मृति ।
स्नात्वा सचैलः स्पृष्ट्वाग्निं घृतं प्राश्य विशुध्यति॥१०३॥
न विप्रं स्वेषु तिष्ठत्सु मृते शूद्रेण नाययेत् ।
अस्वर्ग्या ह्याहुतिः सा स्याच्छूद्रसंस्पर्शदूषिता॥१०४॥
हे द्विजो ! यह सपिण्डों की मरणाशौच विधि कही गई है। अब
असपिण्डों की विधि सुनो। असपिण्ड द्विज की मृत्यु होने पर,
उसको बन्धु के तरह उठाना, दाह देना और माता के समीप के
भाई वहन आदि का भी उसी तरह कर्म करना। इसमें तीन दिन
का आशौच होता है। जो दाहादि करनेवाला मृतक के सपिण्डों
का अन्न खाता हो तो दश दिन में, और न खाता हो न उसके
मकानही में रहता हो तो एक दिन में, शुद्ध हो जाता है। अपनी
जाति, या दूसरी जाति के शव का अनुगमन करने से, सचैल
स्नान, अग्निस्पर्श और घृत खाने से शुद्धि होती है। सजातियों
के रहते शूद्रों से, ब्राह्मण शव का वाहन कभी न कराना। क्योंकि
शूद्र स्पर्श से दूषित शव की आहुति, उसको स्वर्गदायक
नहीं होती ॥ १००-१०४ ॥
ज्ञानं तपोऽग्निराहारो मृन्मनोवार्युपाञ्जनम् ।
वायुः कर्मार्ककालौ च शुद्धेः कर्तॄणि देहिनाम् ॥१०५॥
सर्वेषामेव शौचानामर्थशौचं परं स्मृतम् ।
योऽर्थे शुचिर्हि सशुचिर्नमृद्वारिशुचिः शुचिः॥१०६॥
क्षान्त्या शुध्यन्ति विद्वांसो दानेनाकार्यकारिणः ।
प्रच्छन्नपापा जप्येन तपसा वेदवित्तमाः ॥१०७॥
ज्ञान, तप, अग्नि, भोजन, मिट्टी, मन, जल, लीपना, वायु,
कर्म, सूर्य और काल ये सब प्राणियों की शुद्धि करनेवाले हैं।
सब शुद्धियों में न्याय से मिले धन की शुद्धि श्रेष्ठ कही है। जो