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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 311 of 649

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Page 311

पांचवां अध्याय । १७१
बैजिकादभिसंबन्धादनुरुन्ध्यादघं त्र्यहम् ॥ ६३ ॥
अह्ना चैकेन रात्र्या च त्रिरात्रैरेव च त्रिभिः ।
शवस्पृशो विशुध्यन्ति त्र्यहादुदकदायिनः ॥ ६४ ॥
जैसा मरने पर सपिण्डों को यह आशौच कहा है, वैसा ही पुत्र
आदि उत्पन्न होने में भी अच्छी शुद्धता की इच्छा करनेवालों को
आशौच होता है। मरण आशौच सब सपिण्डों को और जन्मा-
शौच माता पिता को ही होता है। उसमें भी पिता स्नान करने से
शुद्ध होता है। माता को ही सूतक रहता है। पुरुष जानकर वीर्य-
पात करे तो स्नान से शुद्ध होता है । और दूसरी स्त्री में
संतान पैदा करने पर उसको तीन दिन तक आशौच रहता है।
शव (मुर्दा) को छूनेवाले दश दिन में शुद्ध होते हैं और समानो-
दक अर्थात् सात पीढ़ी से ऊपर के पुरुष तीनदिन में शुद्ध
होते हैं ॥ ६१-६४ ॥
गुरोः प्रेतस्य शिष्यस्तु पितृमेधं समाचरन् ।
प्रेतहारैः समं तत्र दशरात्रेण शुध्यति ॥ ६५ ॥
रात्रिभिर्मासतुल्याभिर्गर्भस्त्राने विशुध्यति ।
रजस्युपरते साध्वी स्नानेन स्त्री रजस्वला ॥ ६६ ॥
नृणामकृतचूड़ानां विशुद्धिर्नैशिकी स्मृता ।
निर्वृत्तचूडकानां तु त्रिरात्राच्छुद्धिरिष्यते ॥ ६७ ॥
ऊनद्विवार्षिकं प्रेतं निदध्युर्बान्धवा बहिः ।
अलंकृत्य शुचौ भूमावस्थिसंचयनादृते ॥ ६८ ॥
शिष्य, अपने गुरु की अन्त्येष्टि करता हुआ, शव उठाने वालों के
साथ दशवें दिन शुद्ध होता है। जितने मास का गर्भपात हो उतनी
ही रात्रि में स्त्री शुद्ध होती है। और रजस्वला स्त्री रजंबंद होनेपर
स्नान करके शुद्ध होती है। जिन बालकों का चूड़ाकर्म नहीं हुआ