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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

Page 308 of 649

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Page 308

या वानप्रस्थ आश्रम में रहकर, द्विज को वेदविरुद्ध हिंसा कभी
आपत्ति में भी न करनी चाहिए। इस जगत् में जो वेदानुसार हिंसा
नियत है उसको हिंसा न माननी चाहिए। क्योंकि धर्म वेद से ही
प्रकट हुआ है। जो पुरुष अहिंसक प्राणियों को अपने सुख की
इच्छा से मारता है, वह जीता या मरा हुआ कहीं सुख नहीं
पाता ॥ ४२-४५ ॥
यो बन्धनवधक्लेशान्प्राणिनां न चिकीर्षति ।
स सर्वस्य हितप्रेप्सुः सुखमत्यन्तमश्नुते ॥ ४६ ॥
यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च ।
तदेवाप्नोत्ययत्नेन यो हिनस्ति न किंचन ॥ ४७ ॥
नाकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्पद्यते क्वचित् ।
न च प्राणिवधः स्वर्ग्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्॥ ४८ ॥
समुत्पत्तिं च मांसस्य वधबन्धौ च देहिनाम् ।
प्रसमीक्ष्य निवर्तेत सर्वमांसस्य भक्षणात् ॥ ४९ ॥
जो पुरुष प्राणियों को बांधने या मारने का दुःख नहीं देना
चाहता, वह सबका हित चाहनेवाला पुरुष अनन्त सुख पाता है।
ऐसा पुरुष जो कुछ सोचता है, जो कुछ करता है और जिसमें
अभिलाषा रखता है वह सब सहज में ही उसको प्राप्त होजाता है।
प्राणियों की हिंसा बिना मांस उत्पन्न नहीं होता और प्राणियों के
वध से स्वर्ग भी नहीं मिलता, इसलिए मांस खाना छोड़ देना
चाहिए। मांस की उत्पत्ति और प्राणियों के वध आदि कर्मों को
देखकर सब प्रकार के मांस भक्षण से चित्त को हटा लेना
चाहिए ॥ ४६-४९ ॥
न भक्षयति यो मांसं विधिं हित्वा पिशाचवत् ।
स लोके प्रियतां याति व्याधिभिश्च न पीड्यते ॥५०॥