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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

by महर्षि मनु

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished649 pages

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मनुस्मृति की
भूमिका ।
विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव ।
यद्‍भद्रं तन्न आसुव ॥ (यजु० अ० ३० मं० ३)
धर्म ।
धर्मशास्त्र के अत्यावश्यक कुछ विषय संक्षेप से लिखते
हैं जिनके न जानने से वर्तमान काल में बड़ी भारी हानि है।
ये विषय प्रायः धर्मसंहिता नामक निबन्ध ग्रन्थ से लिये
गये हैं ।
यहां धर्म शब्द, पङ्कजशब्द के समान योग रूढ़ है । गिरते
हुए मनुष्य का जो आधार होकर धारण करता है वह धर्म
है। यह धर्म शब्द का अक्षरार्थ कहलाता है । और अनिष्ट से
संबन्ध न रखनेवाले इष्टफल का साधन धर्म है । यह धर्मशब्द
का प्रसिद्ध अर्थ कहलाता है । भगवान् कणाद मुनि ने
वैशेषिकदर्शन में 'यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः'
यह धर्म का लक्षण कहा है । अर्थात् जिस से लौकिक और
पारलौकिक सुख प्राप्त हो वह धर्म है। और भगवान् जैमिनि
मुनि ने मीमांसादर्शन में 'चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः' यह
क्रियासापेक्ष धर्म का लक्षण कहा है । अर्थ-जिस वाक्य के
सुनने से कर्तव्य तथा अकर्तव्य कर्म का ज्ञान होवे उस (वाक्य)
का चोदना, प्रेरणा, उपदेश और विधि नाम है; जिससे
१ यह ग्रन्थ पूज्यपाद श्री ६ दुर्गाप्रसाद द्विवेदीजी, प्रधानाध्यापक, संस्कृत कालेज-
जयपुर, का बनाया हुआ है । इसमें धर्मशास्त्र के गूढ़तत्त्वों का विशिष्ठ विवेचन है ।